चुनाव में अपने लिए 'मिठास' नहीं, बल्कि बेहतर इलाज चाह रहे मधुमेह मरीज

पश्चिम बंगाल में एक करोड़ से अधिक diabetes patients आगामी विधानसभा चुनाव के माध्यम से अपने लिए better care की उम्मीद लगाए बैठे हैं। यह विशाल community केवल दवाओं के लिए नहीं, बल्कि सामाजिक awareness , स्कूलों में सुरक्षा और स्वास्थ्य ढांचे में बदलाव की मांग कर रहा है। वे चाहते हैं कि नई सरकार उनकी समस्याओं पर serious attention दे और policy स्तर पर ठोस action उठाए।

कोलकाता की 31 वर्षीय रंगमंच कर्मी पामेला साधुखां, जो टाइप-1 मधुमेह से 17 साल से जूझ रही हैं, कहती हैं कि समाज में इस बीमारी को लेकर कई myths हैं। एक बड़ा गलत धारणा यह है कि टाइप-1 मरीज माता-पिता नहीं बन सकते। "मेरा आठ साल का बेटा है", वे कहती हैं, "लेकिन इस कलंक के कारण कई लोगों की शादियां टूट जाती हैं। नई सरकार को इन myths को तोड़ने के लिए public campaign चलाने चाहिए।"

आइटी पेशेवर उत्तम दास बताते हैं कि स्कूल जाने वाले टाइप-1 मरीज बच्चों के साथ अक्सर neglect होती है। अचानक sugar level गिरने पर उन्हें ग्लूकोज टैबलेट या मॉनिटरिंग मशीन की जरूरत होती है, लेकिन अधिकांश schools में ऐसी facilities नहीं हैं। वे मांग करते हैं कि मधुमेह को school curriculum में शामिल किया जाए ताकि awareness बढ़े।

हावड़ा के वाशिंदा संजय दास, जो टाइप-2 मधुमेह से पीड़ित हैं, कहते हैं कि सरकारी अस्पतालों में treatment की व्यवस्था अधूरी है। नि:शुल्क दवाओं की availability और quality पर सवाल हैं। वे मांग करते हैं कि हर जिला अस्पताल में separate clinic खोला जाए और महंगी दवाओं के prices नियंत्रित किए जाएं।

गैर-सरकारी संगठन 'डायबिटीज अवेयरनेस एंड यू' के संस्थापक सचिव इंद्रजीत मजुमदार के अनुसार, राज्य की करीब 15% आबादी मधुमेह से ग्रस्त है, जबकि कोलकाता में यह आंकड़ा 25% तक पहुंच गया है। एक बड़ा वर्ग प्री-डायबिटिक अवस्था में है। उनका कहना है कि बिना सरकारी हस्तक्षेप के इस संकट को नहीं रोका जा सकता। ताकि अगली सरकार गंभीर planning करे और नीतियों को effectively लागू करे।

प्रतिक्रियाएँ 6

  • स्नेहा_कोलकाता

    मेरी बेटी टाइप-1 है, स्कूल ने उसे एक बार इंसुलिन लेने से रोक दिया था। emergency care के लिए नियम बनने चाहिए।

  • अजीत_मेदिनी

    सरकारी अस्पतालों में तो डॉक्टर भी नहीं मिलते, separate clinic की बात कैसे हो सकती है? basic facilities पहले आएं।

  • प्रियंका_आचार्य

    मिठास तलाश रहे मरीज? ये शीर्षक बहुत हल्का है। ये लोग सम्मान और rights चाहते हैं, humor नहीं।

  • राजीव_बागीचा

    जब तक public health को प्राथमिकता नहीं मिलेगी, तब तक दीर्घकालिक बीमारियां बढ़ती रहेंगी।

  • मेघना_डी

    मैं भी टी2डी हूं। इंसुलिन की कीमत इतनी बढ़ गई है कि monthly expense में ही डूब जाते हैं। price control जरूरी है।

  • अनुज_जागृति

    क्या कोई राजनीतिक दल वास्तव में health agenda पर चुनाव लड़ेगा, या ये सब सिर्फ election time की बात है?

यह लेख तथ्यों पर आधारित है और अंग्रेज़ी सीखने के लिए पुनर्रचित किया गया है; पाठक प्रतिक्रियाएँ विविध दृष्टिकोणों के उदाहरण हैं।

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