पश्चिम बंगाल में 34 लाख लोगों को वोट डालने से रोका, SC ने अंतरिम अधिकार देने से किया इनकार
पश्चिम बंगाल में लाखों नागरिकों के वोट डालने के अधिकार पर सुप्रीम कोर्ट के ताज़ा फैसले ने राजनीतिक और सामाजिक tension को एक नई ऊंचाई दे दी है। स्पेशल इंटेंसिव रिव्यू (SIR) के दौरान जिन 34 लाख से अधिक लोगों के नाम मतदाता सूची से हटाए गए, उन्होंने अदालत में appeal दायर कर अंतरिम मताधिकार की मांग की थी। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस मांग को खारिज कर दिया, जिससे आगामी चुनावों में उनकी भागीदारी पर गंभीर doubt पैदा हो गया है।
मुख्य न्यायाधीश का कहना था कि अंतरिम वोटिंग अधिकार देने से अपीलीय ट्रिब्यूनल पर काम का burden बढ़ जाएगा। उन्होंने यह भी कहा कि ऐसा करना practically असंभव है, क्योंकि इससे नए conflict पैदा हो सकते हैं। टीएमसी के वकील कल्याण बनर्जी ने जोर देकर कहा कि लोग न्याय की उम्मीद लेकर अदालत की ओर देख रहे हैं और वोट देना उनका basic right है।
अदालत ने कलकत्ता हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश से मिले अपडेट के आधार पर अपना फैसला सुनाया। उन्होंने बताया कि 60 लाख से अधिक objections और दावों को निपटाया जा चुका है और 1823 मामलों में निर्णय लंबित हैं। इसके बावजूद, सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट कर दिया कि वह interim relief देने के लिए तैयार नहीं है, क्योंकि यह प्रक्रिया को और complicate बना सकता है।
अपने आदेश में अदालत ने सुरक्षा के मुद्दे पर भी ज़ोर दिया। भारत सरकार, निर्वाचन आयोग और राज्य सरकार को निर्देश दिया गया है कि न्यायिक अधिकारियों की security किसी भी परिस्थिति में नहीं छीनी जाए। यह कदम ऐसे समय में आया है जब चुनावी तनाव चरम पर है और लोकतांत्रिक process पर नज़र रखना और भी ज़रूरी हो गया है।
तमाम तर्कों के बावजूद, यह स्पष्ट है कि 23 अप्रैल को होने वाले पहले चरण के चुनाव में लाखों लोग वोट नहीं डाल पाएंगे। इस फैसले का impact न केवल राजनीतिक बलों पर पड़ेगा, बल्कि आम जनता के trust को भी चुनौती देगा। लोग यह सवाल पूछ रहे हैं कि क्या लोकतंत्र के दिल कहे जाने वाले मताधिकार को अब न्यायिक delay की चपेट में रहना पड़ेगा।
34 लाख लोगों को वोट न डालने देना सिर्फ legal issue कानूनी मुद्दा नहीं, बल्कि लोकतंत्र के साथ खिलवाड़ है।
अदालत को लग रहा है कि burden बोझ बढ़ेगा, लेकिन क्या नागरिकों के अधिकारों की अनदेखी करना और भी बड़ा बोझ नहीं है?
मैं बंगाल से हूँ। यहाँ के लोगों के लिए वोट देना सिर्फ एक right अधिकार नहीं, बल्कि गर्व का विषय है।
अगर 60 लाख आपत्तियां निपट चुकी हैं, तो 1823 मामलों में delay देरी क्यों? प्रक्रिया में पारदर्शिता कहाँ है?
हाईकोर्ट में तीन सेवानिवृत्त न्यायाधीशों की समिति बनाना positive step सकारात्मक कदम है, लेकिन क्या यह चुनाव से पहले काम आएगा?
अंतरिम अधिकार न देना सख्त, लेकिन practical reality व्यावहारिक वास्तविकता भी तो है। जल्दबाज़ी में फैसला भी खतरनाक हो सकता है।