जब रामायण के चमत्कार ने कोमा से जगाया लड़का और मृतकों को बैठाकर दिखाई गई टीवी पर
epic 'रामायण' का नाम आते ही दिमाग में राम, लक्ष्मण और सीता की छवियाँ तैरने लगती हैं। लेकिन अगर बात आ जाए रामानंद सागर की टीवी सीरिज की, तो वह सिर्फ एक श्रृंखला नहीं — एक सांस्कृतिक घटना थी। 1987 का वह दौर, जब भारत पूरा टीवी स्क्रीन के सामने घुटने टेक देता था, जब सड़कें सूनी हो जाती थीं और ट्रेनों के लिए भी लोग इंतजार कर लेते थे — सिर्फ इसलिए कि broadcast हो रहा था 'रामायण' का। इतना गहरा था उसका impact कि आज तक कोई और रूप उस जगह को नहीं छू पाया।
लेकिन क्या आप जानते हैं कि इसके प्रभाव ने केवल जीवित लोगों तक ही नहीं, बल्कि मृतकों तक को छू लिया था? किताब 'एन एपिक लाइफ' में बताया गया है कि कई जगहों पर मृतकों की अंतिम यात्रा रोक दी जाती थी, ताकि उन्हें final time 'रामायण' दिखाया जा सके। शव को सम्मान के साथ कुर्सी पर बैठाया जाता, आंखें खुली रखी जातीं और टीवी की screen की ओर मोड़ दिया जाता। लोगों का मानना था कि भगवान राम के दर्शन से आत्मा का मार्ग सुगम हो जाएगा।
और फिर एक और किस्सा है — 15 साल के एक लड़के का, जो बॉम्बे के hospital में कोमा में पड़ा था। कई दिनों से बेहोशी की अंधेरी दुनिया में था। उसकी माँ और बहन रोज आतीं, पर कोई प्रतिक्रिया नहीं मिलती थी। फिर एक रविवार सुबह, अस्पताल के कॉमन वार्ड में किसी ने टीवी लगा दिया। 'रामायण' शुरू हुई।
और फिर कुछ ऐसा हुआ जिसने सबको shock में डाल दिया। लड़के के चेहरे पर भाव बदलने लगे। जैसे-जैसे एपिसोड आगे बढ़ा, उसकी आंखें हल्की सी खुलीं। और जैसे ही एपिसोड खत्म हुआ, वह अचानक बैठ गया। सब हैरान। डॉक्टर दौड़े। माँ और बहन की आंखों में आंसू। पहला सवाल जो उसने पूछा — लक्ष्मण जिंदा हैं क्या? इंद्रजीत के बाण से उन्हें चोट लगी थी। ये पहली बात थी जिसे उसने सुना था, जब वह बेहोश था। और वही उसे जीवन में वापस ले आया।
रामानंद सागर ने यह श्रृंखला बनाने के लिए सब कुछ दांव पर लगा दिया था — अपना bungalow , संसाधन, ऊर्जा। उनके बेटे मोती सागर ने कहा था कि उनके पिता ने एक बार कहा था — 'चाहे बंगला बेचना पड़े, मैं 'रामायण' बनाकर रहूंगा।' और वे नहीं जानते थे कि वह सिर्फ एक टीवी शो नहीं बना रहे, बल्कि एक आध्यात्मिक लहर छोड़ रहे हैं, जो सड़कों, अस्पतालों और अंतिम यात्राओं तक पहुंच जाएगी।
आज भी जब 'रामायण' की कोई बात आती है, तो सिर्फ नोस्टैल्जिया की बात नहीं होती। बल्कि यह याद दिलाती है कि कैसे एक टेलीविजन शो देश की राष्ट्रीय जीवनशैली का हिस्सा बन सकता है। वह यह भी दिखाता है कि कैसे faith , media और सामूहिक भावना एक-दूसरे को छू सकते हैं — इतनी गहराई से कि जीवन और मृत्यु की सीमा भी धुंधली पड़ जाए।
अब सवाल यह नहीं कि ये 'चमत्कार' थे या नहीं। सवाल यह है कि कैसे एक कहानी ने लाखों लोगों के दिलों पर इतना गहरा प्रभाव डाला कि वे उसे सच मानने लगे — चाहे वह जिंदगी में हो या मौत के बाद।
मेरे दादाजी भी कहते थे कि गांव में कोई न चलता तो सुबह की अराम से 'रामायण' देख लें। भक्ति का असली मतलब तब समझ आया।
आज के शो में वो magic जादू नहीं है। बजट बड़ा है, VFX है, पर soul आत्मा नहीं है। रामानंद सागर ने दिल से बनाया था।
लड़के का किस्सा सुनकर रोंगटे खड़े हो गए। अगर आखिरी बात जो उसने सुनी थी, वही उसे जगा सकती है, तो कहानी की ताकत क्या होगी?
art कला कभी-कभी चिकित्सा से भी आगे जा सकती है। ये कोमा वाला पल साबित करता है। उपचार के नए तरीके हो सकते हैं।
मैंने खुद देखा है कि लोग अपने पिता-माता के अंतिम संस्कार से पहले टीवी लगा देते थे। अंतिम विधि का हिस्सा था ये।
भावनाएं गहरी हैं, लेकिन क्या ये सचमुच कोमा था? कभी-कभी मस्तिष्क आंशिक रूप से काम करता है। फिर भी, hope उम्मीद का पल था।
मम्मी कहती थीं — 'रामायण' देखो, बुराई नहीं लगती। आज लगता है, शायद वो सच में नहीं लगती थी। रक्षा का एहसास था।
इसे कोई सामान्य टीवी शो नहीं कह सकता। ये राष्ट्रीय घटना थी। आज के OTT के जमाने में ऐसा कभी नहीं होगा।