पॉवर गेम में मात खाया सुपरपावर; फ़ारस की खाड़ी की लहरों में डूब रहा उसका गुरूर
अमेरिका और इरान के बीच एक दिन सुलह हो भी जाए, new plan ने तनाव कम कर भी लिया, लेकिन इतिहास यही लिखेगा: एक superpower था जो दुनिया के हर मोड़ पर अपनी मर्ज़ी थोपने की कोशिश करता था। वह इराक की गलियों को मलबे में बदल चुका था, सीरिया में नागरिक युद्ध को भड़काया, लीबिया और वेनेजुएला में सरकारें गिरा चुका था। उसे लगा कि फारस की खाड़ी में भी उसकी power को कोई चुनौती नहीं दे सकता। लेकिन उसे अंदाज़ा नहीं था कि यहाँ उसका सामना एक ancient civilization से होगा, जिसकी जड़ें सदियों पुरानी हैं और जो अपने dignity के लिए न झुके, न टूटे।
ईरान ने न केवल अमेरिकी दबाव झेला, बल्कि उसे यह भी बता दिया कि दुनिया सिर्फ weapons और प्रतिबंधों से नहीं चलती। अमेरिका ने समुद्र और आसमान दोनों जगह घेराबंदी की, लेकिन ईरान की फौलादी दीवार में एक crack तक नहीं डाल सका। इस जंग ने दिखाया कि pride जब अंधा कर दे, तो वह खुद ही अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारता है। अमेरिका की जंगबाज़ी ने उसके ही सहयोगियों को दूर कर दिया। सऊदी अरब, कतर, कुवैत और यूएई जैसे देश अब अमेरिका के इशारे पर नहीं चलते। यह उसकी सबसे बड़ी diplomatic defeat है।
फ्रांस, ब्रिटेन, इटली, स्पेन और नॉर्वे जैसे NATO देशों ने ट्रंप की जंग में शामिल होने से इनकार कर दिया। वे न तो होर्मुज़ खोलने की अपील पर आए, न ही पर्शियन गल्फ़ में नाकेबंदी का समर्थन किया। इस नाकामी ने पुराने गठबंधनों की नींव हिला दी। ट्रंप ने चीन पर दबाव बनाने की कोशिश की, दावा किया कि चीन ईरान को एडवांस एयर डिफेंस सिस्टम देने वाला है। लेकिन चीन ने इसे baseless बताकर खारिज किया। बीजिंग ने साफ कहा: हम अपने domestic laws और अंतरराष्ट्रीय नियमों का पालन करते हैं।
अमेरिका ने चीनी टैंकरों को होर्मुज़ स्ट्रेट से गुजरने नहीं देने की धमकी दी। लेकिन एक चीनी जहाज़ रिच स्टारी ने अमेरिकी प्रतिबंधों को ताख पर रखकर रास्ता पार किया। इसके बाद छह से ज़्यादा चीनी जहाज़ों ने बिना किसी रोक के गल्फ़ से गुज़रना जारी रखा। इस defiance ने ट्रंप के तेवर ढीले कर दिए। उन्होंने दावा किया कि वे हमेशा के लिए होर्मुज़ खोल रहे हैं—चीन और दुनिया के लिए। लेकिन यह घोषणा किसी मजबूरी जैसी लगी, न कि जीत जैसी।
इसी बीच, रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव चीन पहुंच गए, जो ट्रंप के चीन दौरे से पहले की एक preemptive move थी। यह साफ था कि मॉस्को और बीजिंग पहले से ही एकजुट हो चुके हैं। दोनों देश डॉलर पर निर्भरता कम करने के लिए BRICS के ज़रिए एक नए payment system पर काम कर रहे हैं जो SWIFT को चुनौती दे सके। रूसी पाइपलाइनें अब सीधे चीन की ओर मुड़ चुकी हैं। इस नए विश्व क्रम में, अमेरिका के पास पुराने टैरिफ़ के हथियार हैं, लेकिन चीन के पास रूस की ऊर्जा गारंटी है।
अमेरिका अब धीरे-धीरे अपने पुराने दुश्मनों के सामने अकेला खड़ा है। जब ट्रंप चीन पहुंचेंगे, तो उनके सामने एक ऐसी दीवार होगी जो पहले से तय निर्णयों पर खड़ी है। यह पावर गेम अब एक ऐसे मोड़ पर है जहाँ सुपरपावर को अपनी वास्तविक नीति नए सिरे से सोचनी होगी। वरना इतिहास यही दर्ज करेगा: जब ट्रंप ने कदम बढ़ाया, तब रूस और चीन ने रास्ते ही बदल दिए थे।
अमेरिका को लगता था कि वो दुनिया को अपनी मुट्ठी में ले सकता है, लेकिन pride गुरूर ने उसे अंधा कर दिया।
होर्मुज़ के रास्ते से तेल जाता है, लेकिन यहाँ की लहरें अब dignity वक़ार की गवाही भी दे रही हैं।
चीन और रूस का साथ अमेरिका के लिए बड़ा strategic pressure रणनीतिक दबाव बन गया है।
अमेरिका के पास अब कोई real option वास्तविक विकल्प नहीं है—या तो झुकना होगा या अपने फायदे गंवाने होंगे।
BRICS का नया payment system भुगतान प्रणाली डॉलर के एकाधिकार के लिए चुनौती है।
जब तक ट्रंप ने कदम बढ़ाया, तब तक रूस और चीन ने diplomacy कूटनीति से रास्ते बदल दिए।