अमेरिका-ईरान संघर्ष में आगे क्या होगा? ये हैं चार संभावित परिदृश्य
पाकिस्तान में हुई तीस-घंटे की बातचीत के बाद अमेरिका और ईरान के बीच लागू दो हफ्ते का truce अब एक नाजुक राजनीतिक जुगत में तब्दील हो गया है। जहां तेहरान में जश्न के बीच लोगों ने relief की सांस ली, वहीं वाशिंगटन ने अगले ही दिन स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ पर naval blockade की घोषणा कर दी। यह घटनाक्रम दिखाता है कि युद्धबंदी के बावजूद, दोनों तरफ़ के बीच distrust अभी भी गहरा है।
इस बीच, विशेषज्ञों को चिंता है कि यह ceasefire एक लंबे युद्ध के बीच एक रणनीतिक विराम हो सकता है — जहां दोनों पक्ष अपनी military posture को समंजित कर सकें। थिंक टैंक फॉर डिफेंस ऑफ डेमोक्रेसीज के बेहनाम बेन तालेब्लू का कहना है कि दोनों देशों के बीच मूलभूत policy differences इतने गहरे हैं कि युद्ध ने उन्हें नहीं, बल्कि और बढ़ा दिया है।
अगला संभावित परिदृश्य 'शैडो वॉर' का है — जहां सीमित हमले, proxy groups की गतिविधियां और बुनियादी ढांचे पर लक्षित कार्रवाई जारी रहें। यह तनाव खुले युद्ध तक नहीं जाएगा, लेकिन रक्तपात जारी रह सकता है। ऐसे में त्रुटि का risk बढ़ जाता है: एक छोटी गलती, एक अनुचित जवाब — और टकराव बिना किसी इरादे के बेकाबू हो सकता है।
तीसरा विकल्प है कूटनीति का धीमा जारी रहना। पाकिस्तान, क़तर, ओमान और मिस्र जैसे देश मध्यस्थता के लिए आगे आ सकते हैं। लेकिन अभी तक अमेरिका का 15-बिंदु और ईरान का 10-बिंदु प्रस्ताव दिखाता है कि दोनों पक्ष अपनी negotiating stance से पीछे नहीं हट रहे। इसलिए, comprehensive deal की उम्मीद अभी दूर है।
अंतिम और सबसे खतरनाक संभावना है समुद्री नाकाबंदी का बढ़ना। अगर अमेरिकी नौसेना स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ पर पूरी तरह कब्जा कर ले, तो ईरान लाल सागर और ओमान की खाड़ी में जहाजरानी पर retaliatory strike की धमकी दे चुका है। इससे वैश्विक तेल बाजार में economic pressure बढ़ेगा, चीन जैसे खरीदार प्रभावित होंगे, और क्षेत्र एक 'ग्रे ज़ोन' में प्रवेश कर सकता है — जहां न तो युद्ध पूरा है, न ही शांति।
इस स्थिति में, छोटी घटनाएं बड़े consequences ला सकती हैं। जैसा कि विश्लेषक हमीदरेज़ा अज़ीज़ी कहते हैं, दोनों तरफ़ के लिए संघर्ष खत्म करना जरूरी है, लेकिन यह जल्दी होना unrealistic लगता है। अब दुनिया उस धुंधली सीमा पर खड़ी है जहां diplomacy और conflict एक साथ चल रहे हैं।
ये युद्धविराम तो सिर्फ अपनी military readiness सैन्य तैयारी बढ़ाने का मौका है। दोनों तरफ़ असली शांति चाहने वाले कहां हैं?
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ पर नाकाबंदी का मतलब है वैश्विक market shock बाजार झटका. भारत जैसे तेल आयातक देशों को सीधा नुकसान होगा।
अमेरिका की नाकाबंदी की घोषणा के बाद ईरान की चेतावनी तो समझ आती है। लेकिन क्या वो वाकई shipping routes जहाजरानी मार्ग बाधित कर पाएगा?
इसराइल की भूमिका अनदेखी नहीं की जा सकती। वो चाहे तो किसी ईरानी अधिकारी की targeted killing लक्षित हत्या करके पूरे समीकरण बदल सकता है।
इतने सारे मध्यस्थ? पर क्या वाकई कोई सुनेगा? जब तक दोनों तरफ़ के नेता political will राजनीतिक इच्छाशक्ति नहीं दिखाएंगे, कुछ नहीं बदलेगा।
समझ नहीं आता — क्यों हर बार युद्ध ही एकमात्र solution समाधान लगता है? कूटनीति को मौका क्यों नहीं मिलता?