सपा का बस चले तो..., लोकसभा में शाह vs अखिलेश, संसद में धर्म आधारित आरक्षण का उठा मुद्दा
लोकसभा में धर्म आधारित आरक्षण को लेकर गुरुवार को एक तीखी बहस छिड़ गई, जब केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने समाजवादी पार्टी की मांग को स्पष्ट रूप से खारिज कर दिया। उन्होंने कहा कि constitutional limits के भीतर ही सामाजिक न्याय की बात की जा सकती है। महिला आरक्षण नीति में धर्म का कोई place नहीं है, और ऐसी मांग न तो law के अनुकूल है और न ही public trust को मजबूत करती है।
शाह ने स्पष्ट किया कि भारत का संविधान religion-based आरक्षण की अनुमति नहीं देता, और यह मुद्दा साफ रूप से उठता नहीं। उनका यह statement सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव की उस मांग के जवाब में आया, जिसमें मुस्लिम महिलाओं के लिए अलग से आरक्षण की वकालत की गई थी। शाह ने कहा कि अगर अखिलेश यादव मुस्लिम महिलाओं को अधिक representation देना चाहते हैं, तो वे बस अपने दल के सभी टिकट उन्हें दे सकते हैं — भाजपा को इस पर कोई ऐतराज नहीं होगा।
सपा ने आरोप लगाया था कि सरकार महिला आरक्षण लागू करने के नाम पर जनगणना और जातीय आंकड़ों को टाल रही है। इसके जवाब में शाह ने कहा कि जनगणना शुरू हो चुकी है, और इसके दूसरे चरण में caste data भी शामिल की जाएगी। उन्होंने मजाकिया अंदाज में कहा कि houses की जाति नहीं होती, और अगर सपा का बस चले तो वह घरों की भी जाति तय कर देंगे। यह टिप्पणी विपक्षी सदस्यों के बीच tension पैदा कर गई।
गृह मंत्री ने जोर देकर कहा कि सरकार सामाजिक न्याय से पीछे नहीं हट रही, बल्कि इसे systematic और डेटा-आधारित तरीके से लागू करना चाहती है। जातीय जनगणना इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है, ताकि भविष्य की नीतियों के लिए ठोस evidence मिल सके। उन्होंने स्पष्ट किया कि सरकार का लक्ष्य लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ाकर महिलाओं को one-third आरक्षण देना है — जो कि धर्म के बजाय लिंग पर आधारित एक स्पष्ट policy है।
अमित शाह ने सही कहा, संविधान कहां धर्म के आधार पर quota आरक्षण देने की बात करता है? यह तो सिर्फ राजनीति है।
क्या यह सच में data डेटा से आधारित नीति है, या बस जाति गणना को टालने का तरीका? विश्वास कैसे बढ़ेगा?
घरों की जाति नहीं होती — यह बात सुनकर laughter हंसी आ गई, लेकिन यही तो विपक्ष का तर्क भी लग रहा है।
मुस्लिम महिलाओं के लिए अलग आरक्षण की मांग वाजिब है या नहीं, लेकिन discrimination भेदभाव को बढ़ावा देने का खतरा तो है।
अगर लक्ष्य women's reservation महिला आरक्षण है, तो धर्म को बीच में क्यों लाया जा रहा है? यह तो ध्येय भटकाने की कोशिश है।
जातीय गणना आखिरकार होगी, लेकिन timing समय पर होगी या चुनाव के बाद? इसी पर सब कुछ टिका है।