अशोक गहलोत ने महिला आरक्षण पर उठाए बड़े सवाल: जल्दबाजी क्यों?
महिला आरक्षण विधेयक पर राष्ट्रीय स्तर पर बहस तेज हो गई है, और पूर्व राजस्थान मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने केंद्र सरकार पर direct हमला बोला है। उन्होंने कहा कि इतना big decision करने से पहले widespread discussion और consensus जरूरी थी, जो अभी तक नहीं हुई। उन्होंने haste का आरोप लगाते हुए कहा कि यह policy सिर्फ चुनावी फायदे के लिए लागू की जा रही है।
गहलोत ने इतिहास का हवाला देते हुए कहा कि राजीव गांधी के दौर में पंचायतों में 33% आरक्षण की शुरुआत की गई थी, जिससे महिलाओं को empower बनाने का रास्ता खुला। उन्होंने सोनिया गांधी के विचारों का भी समर्थन किया कि संसद और विधानसभाओं में भी महिलाओं की equal participation होनी चाहिए। उन्होंने याद दिलाया कि 1993 में पंचायत आरक्षण के पहले कई साल तक national debate चली थी, लेकिन आज विपक्ष को confidence में लिए बिना कदम उठाया जा रहा है।
उन्होंने सवाल उठाया कि अगर यह कानून 2023 में ही पारित हो गया था, तो इसे लागू करने में three years क्यों लगे? पहले direct implementation करने की बात हुई, फिर census और delimitation का हवाला दिया गया। अब अचानक जल्दबाजी क्यों? उनके मुताबिक, पश्चिम बंगाल चुनाव के समय इसे लागू करने के पीछे political advantage उठाने की रणनीति है। उन्होंने चेतावनी दी कि बिना स्पष्टता के आगे बढ़ना risky हो सकता है, खासकर छोटे राज्यों और उत्तर-पूर्वी राज्यों में concerns बढ़ सकती हैं।
गहलोत ने बीजेपी के आंतरिक विवाद पर भी टिप्पणी की, जहां पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के बयान को लेकर तनाव है। उन्होंने कहा कि यह उनका internal matter है, लेकिन पार्टी अध्यक्षों की ओर से unnecessary statements उचित नहीं है। उन्होंने मोदी जी के लिए टिप्पणी छोड़ने की बात कही और जोर देकर कहा कि कांग्रेस united है और अगली सरकार उनकी होगी।
अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर बोलते हुए गहलोत ने कहा कि दुनिया में बढ़ रहे तनाव के बीच भारत को mediation role निभानी चाहिए थी। उन्होंने पाकिस्तान का नाम लिए बिना टिप्पणी की कि जिस देश को लंबे समय से terrorism से जोड़ा गया है, आज वह शांति की बात कर रहा है। उन्होंने कहा कि ईरान-इराक जैसे संघर्षों में भारत को आगे आना चाहिए था, क्योंकि दुनिया peace की उम्मीद भारत से जोड़ती है।
तीन साल तक कानून लागू नहीं किया, अब चुनाव से पहले जल्दबाजी में क्यों? haste जल्दबाजी में लिया गया फैसला कभी अच्छा नहीं होता।
गहलोत ने consensus सर्वसम्मति की बात सही कही। इतना बड़ा बदलाव बिना परामर्श के खतरनाक हो सकता है।
महिला आरक्षण जरूरी है, लेकिन क्या यह सच में empowerment सशक्तिकरण के लिए है या सिर्फ वोट बैंक के लिए?
वसुंधरा राजे का मामला बीजेपी की internal conflict आंतरिक लड़ाई दिखा रहा है। एकजुटता का दावा खोखला पड़ रहा है।
पाकिस्तान शांति की बात करे? बहुत मजाकिया है। भारत को mediation मध्यस्थता की भूमिका निभानी चाहिए, लेकिन सरकार चुप क्यों है?
अशोक गहलोत ने सीधे सवाल उठाए। बिना discussion चर्चा के कोई बड़ा फैसला नहीं लेना चाहिए।