आज पेश होगा महिला आरक्षण विधेयक, अखिलेश, राहुल खिलाफ, मायावती दे रहीं प्रधानमंत्री मोदी का साथ, पढ़ें मुख्य बातें
गुरुवार को संसद में special session ने एक ऐतिहासिक मोड़ लिया, जब सरकार ने महिला आरक्षण विधेयक पेश करने की तैयारी पूरी कर ली। इस बिल के जरिए लोकसभा की सीटों की संख्या 543 से बढ़ाकर 850 किए जाने का प्रस्ताव है, जिसके साथ 2029 तक 33 प्रतिशत आरक्षण महिलाओं के लिए लागू किया जाएगा। बहस के लिए 18 घंटे का समय आवंटित किया गया है, जो शुक्रवार तक जारी रह सकती है।
इस महत्वपूर्ण कदम के आगे राजनीतिक tension तेज हो गया है। कांग्रेस सहित कई विपक्षी दलों का कहना है कि सरकार updated census के आंकड़ों की प्रतीक्षा किए बिना जल्दबाजी में कदम उठा रही है, जो उचित नहीं है। कांग्रेस नेता अनंत गाडगिल ने चिंता जताई कि इससे उत्तरी और दक्षिणी राज्यों के बीच emotional division हो सकता है। उन्होंने पूछा कि 2027 तक आने वाली जनगणना रिपोर्ट का इंतजार क्यों नहीं किया जा रहा।
लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने सीधा आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री मोदी OBC representation को नुकसान पहुंचाना चाहते हैं। उन्होंने कहा कि 2011 की जनगणना में ओबीसी की आबादी का आंकड़ा नहीं है, और इसी पुराने आधार पर आरक्षण लागू करना एक dishonest move है। सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने भी इसे conspiracy बताया, जिसका उद्देश्य पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक वर्गों का हक छीनना है।
विपक्ष के विरोध के बीच, कुछ दलों ने समर्थन का संकेत दिया है। बसपा प्रमुख मायावती ने प्रधानमंत्री मोदी को पत्र लिखकर इस कदम को historic reform बताया। उनके साथ पूर्व राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल और पूर्व लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार ने भी विधेयक का स्वागत किया। पाटिल ने कहा कि यह democratic structure को मजबूत करेगा और महिलाओं को नेतृत्व के लिए संस्थागत मौका देगा।
संसद में तीन बिल पेश किए जाएंगे: constitutional amendment , परिसीमन विधेयक और केंद्र-शासित प्रदेश कानून (संशोधन) विधेयक। कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल और गृह मंत्री दोनों इन बिलों को पेश करेंगे। लोकसभा में पारित होने के बाद ये राज्यसभा में जाएंगे, जहां इन पर फिर बहस होगी। इस पूरी प्रक्रिया के बीच, जनता की नजर न केवल आरक्षण पर, बल्कि इसके पीछे की political motives पर भी टिकी है।
33 प्रतिशत आरक्षण अच्छा है, लेकिन क्या ये new seats नई सीटें बनाने से राज्यों के बीच असंतुलन नहीं बढ़ेगा?
महिलाओं का representation प्रतिनिधित्व बढ़ेगा ये बहुत अच्छी बात है, लेकिन ओबीसी के हिस्से में कटौती कैसे स्वीकार्य है?
सरकार का ये hurry जल्दबाजी का रुख दिख रहा है। नई जनगणना के बिना ये फैसले लेना जोखिम भरा है।
मायावती जी का समर्थन देखकर तो लगता है कि शायद कोई real change वास्तविक बदलाव होने वाला है।
कांग्रेस कहती है समर्थन करती है, लेकिन विरोध में खड़ी है। क्या ये सिर्फ political drama राजनीतिक नाटक नहीं?
इतने साल बाद महिलाओं के लिए आरक्षण आ रहा है। क्या ये सिर्फ एक नाटकीय कदम है या वास्तविक सशक्तिकरण की शुरुआत?