ईरान तनाव के बीच बाजार की सांसें तेज: तेल की कीमतें 45% ऊपर, भारत क्या करेगा?
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर navy की नाकेबंदी का आदेश दिया, जिसके बाद वैश्विक तेल बाजार में हलचल मच गई। यह decision अमेरिका और ईरान के बीच विफल वार्ता के बाद आया, जिससे risk में तेजी आई। ब्रेंट क्रूड की कीमतें $102-103 प्रति बैरल पहुंच गईं, जो 2025 के औसत के मुकाबले लगभग 45% अधिक है। इसका सीधा असर भारतीय शेयर बाजार पर भी दिखा: निफ्टी 0.86% गिरकर 23,843 पर बंद हुआ, जबकि अमेरिकी बाजार भी red zone में खुले।
तेल की बढ़ती कीमतों ने न केवल market को हिलाया, बल्कि भारत के आर्थिक pressure को भी बढ़ा दिया है। रुपया 93 के नीचे ट्रेड कर रहा है, और 10 साल की सरकारी बॉन्ड यील्ड में बढ़ोतरी दर्ज की गई। हालांकि, The Wealth Company के अक्षय चिंचलकर का कहना है कि अभी तक impact उतना गंभीर नहीं है जितना अंदाजा था। उनके अनुसार, seasonal factors और कमजोर डॉलर इंडेक्स बाजार को कुछ सहारा दे रहे हैं।
क्या गिरावट अब थम गई? यह सवाल निवेशकों के लिए सबसे बड़ा है। Kotak Securities के श्रीकांत चौहान का मानना है कि तेल की कीमतें अभी भी last year के मुकाबले काफी ऊंची हैं, जो आयात-निर्भर भारत के लिए major concern का विषय है। वहीं, Motilal Oswal के नंदीश शाह का मानना है कि अगर तनाव लंबा नहीं चलता, तो बाजार ने इसका असर पहले ही absorbed लिया है। Waterfield Advisors के विपुल भावर के अनुसार, जैसे ही युद्ध की अवधि स्पष्ट होगी, बाजार economic growth और कंपनियों के नतीजों पर ध्यान केंद्रित कर देगा।
भारत के लिए चुनौतियां गहरा रही हैं। स्ट्रैटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व सिर्फ 64% भरे हैं, जो मौजूदा खपत में 9-10 दिन का भंडार देता है। चाबहार पोर्ट पर अमेरिकी छूट 26 अप्रैल को खत्म होने वाली है, जो एक अहम ऊर्जा रास्ता है। वहीं, ऑयल मार्केटिंग कंपनियां पेट्रोल पर ₹21 और डीजल पर ₹28 प्रति लीटर का loss उठा रही हैं। अगर यह स्थिति 30–45 दिन तक जारी रही, तो सरकार पर subsidy burden बढ़ सकता है।
निवेशकों के लिए एक्सपर्ट्स ने कुछ सुझाव दिए हैं। ऐसे समय में ऑयल अपस्ट्रीम, फर्टिलाइजर, डिफेंस और कुछ PSU स्टॉक्स में गिरावट पर खरीदारी की जा सकती है। अस्थिरता बढ़ सकती है, इसलिए थोड़ी नकदी भी बनाए रखना जरूरी है। निफ्टी का 12 महीने का फॉरवर्ड वैल्यूएशन 18x पर है, जो लंबे समय के औसत से 15% कम है। एक्सपर्ट्स के अनुसार, यह valuation लंबे समय के निवेशकों के लिए ठीक है, लेकिन यह तभी टिकेगा जब तनाव लंबा न खिंचे।
अगर तेल की कीमतें इतनी ऊंची रहीं, तो आम आदमी पर cost लागत का बोझ और बढ़ेगा। पेट्रोल-डीजल के दाम में तो अभी भी छुपा नुकसान है।
यह देखना दिलचस्प है कि बाजार इतनी तेजी से reaction प्रतिक्रिया कैसे देता है। लेकिन क्या वाकई यह सब 'पहले ही झेल लिया गया' है, या बस एक झूठी शांति है?
चाबहार पोर्ट के बारे में जानकर डर लगता है। अगर अमेरिकी छूट खत्म होती है, तो हमारी energy security ऊर्जा सुरक्षा पर क्या असर पड़ेगा?
सरकार को अब तुरंत अपने रिजर्व बढ़ाने की जरूरत है। 9-10 दिन का भंडार युद्धकाल में कुछ नहीं है। जोखिम प्रबंधन कहां है?
18x वैल्यूएशन सस्ता लग सकता है, लेकिन अगर महंगाई बढ़ी, तो real returns वास्तविक रिटर्न घटेंगे। निवेशक सावधान रहें।
डिफेंस स्टॉक्स में खरीदारी? यह तो लगता है जैसे हम युद्ध की उम्मीद कर रहे हैं। नैतिक रूप से यह सही है?