ऑपरेशन महादेव: सिर्फ आतंकियों का सफाया नहीं था, बल्कि देश के जख्मों पर मरहम भी था
पहलगाम आतंकी हमले में शामिल आतंकियों के सफाए के लिए चलाया गया ऑपरेशन महादेव: नई दिल्ली में 28 जुलाई को संसद में ‘ऑपरेशन सिंदूर’ पर चर्चा चल रही थी, लेकिन उसी पल सैकड़ों किलोमीटर दूर श्रीनगर के पास के घने जंगलों में, security forces देश का revenge लेने में जुटी थी। यह सिर्फ एक सैन्य कार्रवाई नहीं थी, बल्कि एक national promise था — उन परिवारों के प्रति जिन्होंने अप्रैल में अपने प्रियजनों को खो दिया था। हमले के कुछ ही घंटों बाद भारतीय सेना के जवान मौके पर पहुंच गए थे, जहां सिर्फ शारीरिक evidence नहीं थे, बल्कि बिखरी हुई कहानियां, डरे हुए गवाह और आंखों में छिपा fear था।
इन टुकड़ों को जोड़कर और intelligence के जरिए एक स्पष्ट तस्वीर सामने आई। हमलावरों की पहचान सुलैमान शाह, हमजा अफगानी और जिब्रान के रूप में हुई, जो लश्कर-ए-तैयबा से जुड़े थे। उनका पता लगाना सिर्फ तकनीकी दृष्टि से ही नहीं, बल्कि human intelligence के जरिए भी हुआ। एक सेना अधिकारी की गवाही भी उस तस्वीर का हिस्सा थी, जिसने उस दर्द को शब्द दिए जो आंखों में था।
ऑपरेशन महादेव की शुरुआत के बाद जंगल, पहाड़, ऊंचाई और मौसम ने अपनी full challenge पेश की। आतंकी लगातार महादेव रिज के साथ लगे दाचीगाम के घने जंगलों में घुसते जा रहे थे। यह क्षेत्र उनके लिए छिपने की आदर्श जगह थी। मई के अंत तक, खतरे की गंभीरता को देखते हुए — खासकर सालाना यात्रा के करीब आने से — ऑपरेशन का scope बढ़ा दिया गया। अतिरिक्त बलों के साथ-साथ पैरा (स्पेशल फोर्सेस) की चुनिंदा यूनिट भी तैनात की गई।
अगले कई हफ्तों तक खुफिया एजेंसियों, सेना, जम्मू-कश्मीर पुलिस और केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल ने आपसी तालमेल से काम किया। ऑपरेशन का क्षेत्र शुरू में 300 वर्ग किलोमीटर से ज्यादा था, लेकिन धीरे-धीरे इसे narrowed down किया गया। ड्रोन आसमान से लगातार नजर रख रहे थे। आधुनिक निगरानी उपकरणों का भरपूर इस्तेमाल किया गया। 10 जुलाई को नई जानकारी मिलने के साथ ही लिदवास, हरवन और दाचीगाम में एक साथ कार्रवाई शुरू हुई। आतंकियों के सभी भागने के रास्तों को बंद कर दिया गया।
28 जुलाई को, एक विस्तृत योजना के तहत, पैरा की टीम ने कठिन इलाके में गुप्त तरीके से 10 घंटे में 3 किलोमीटर की पैदल यात्रा तय की। फिर एक तेज और सटीक कार्रवाई में तीनों आतंकियों को मार गिराया गया। 93 दिन, 250 किलोमीटर का पीछा और अनगिनत मुश्किलों के बाद ऑपरेशन पूरा हुआ। यह सिर्फ आतंकियों का सफाया नहीं था, बल्कि देश के जख्मों पर लगाया गया एक emotional bandage भी था।
हर बार जब ऑपरेशन की बात आती है, मुझे लगता है कि हमारी जमीन पर कितनी tension तनाव भरी जिंदगी चल रही है।
93 दिन, 250 किमी पैदल, घने जंगल, बर्फीले पहाड़ — ये जवान कमाल के हैं। इनकी courage बहादुरी को सलाम।
लेकिन क्या इन ऑपरेशन्स के बाद भी नई योजनाएं बन रही हैं? क्या long-term plan दीर्घकालिक योजना है या सिर्फ प्रतिक्रिया?
मुझे डर लगता है कि अगला हमला कब होगा। ये खबरें पढ़कर anxiety चिंता बढ़ जाती है।
ह्यूमन इंटेलिजेंस और ड्रोन दोनों का इस्तेमाल दिखाता है कि modern warfare आधुनिक युद्ध अब सिर्फ गोलियों से नहीं लड़ा जाता।
कभी-कभी लगता है कि ये सब बस राजनीतिक पोस्टरिंग के लिए होता है।
जिन परिवारों ने अपने खोए, उनके लिए ये ऑपरेशन सच में justice न्याय था। बहुत भावुक हूँ।
ड्रोन और इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल सेंसर का उपयोग कितना critical महत्वपूर्ण था, ये जानकर हैरानी होती है।