सहयोगी से उत्तराधिकारी तक: सम्राट चौधरी का राजनीतिक सफ़र
नीतीश कुमार के resignation के बाद बिहार की राजनीति में एक new era शुरू हो गया है। अब पहली बार राज्य की सत्ता पूरी तरह भाजपा के control में आ गई है। 15 अप्रैल, 2026 को सम्राट चौधरी ने मुख्यमंत्री पद की oath ली। वे भाजपा में शामिल होने के बाद पहले ‘कमल छाप’ नेता हैं जो बिहार के शीर्ष पर पहुंचे हैं। यह shift एनडीए के पिछले चुनाव नारे — ‘पच्चीस से तीस, फिर से नीतीश’ — के तुरंत बाद आया है, जो दर्शाता है कि जनादेश को quickly पुनर्परिभाषित किया गया।
सम्राट चौधरी के चयन पर सवाल उठ रहे हैं। वे कोइरी समुदाय से आते हैं, जो राज्य की आबादी का लगभग 4.3% है और यादवों के बाद का सबसे बड़ा अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) समूह माना जाता है। लेकिन वरिष्ठ पत्रकार नलिन वर्मा का कहना है कि सम्राट को local support के अलावा कहीं भी कोइरी समाज अपना नेता नहीं मानता। उनके मुख्यमंत्री बनने से भाजपा के पाले में कोइरी वोटर आने की expectation गलत है। यह नैरेटिव, उनके अनुसार, media narrative द्वारा बनाया गया है।
सम्राट ने बहुत early age में राजनीति में कदम रखा था। 1999 में पहली बार मंत्री बने, फिर कई पार्टियों — राजद, जदयू, हम, समता पार्टी — में रहे। 2017 में भाजपा में शामिल हुए। नीतीश कुमार के साथ उनका रिश्ता सदा से तनावपूर्ण रहा है। 2022 में एनडीए छोड़ने पर सम्राट ने सार्वजनिक रूप से कहा था कि उनका एकमात्र लक्ष्य नीतीश को मुख्यमंत्री पद से remove है। उन्होंने एक ‘मुरेठा’ भी बांधा था, जिसे वे तभी खोलेंगे जब उनका लक्ष्य पूरा होगा। अब वह लक्ष्य fulfilled हो गया है।
गृह मंत्री के रूप में उनके policies यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ की शैली से मिलते-जुलते थे — एंटी रोमियो स्क्वाड, अपराधियों को धमकी देना, ‘लव जिहाद’ जैसे communal issues उठाना। लेकिन नलिन वर्मा का मानना है कि बिहार में political environment उत्तर प्रदेश जैसा नहीं है। जदयू के साथ गठबंधन और भाजपा के अंदर विरोध के कारण ‘योगी मॉडल’ यहां काम नहीं करेगा।
उनकी educational qualification और age पर भी सवाल उठे हैं। प्रशांत किशोर ने दावा किया कि 1995 के हत्याकांड में उन्होंने अपनी उम्र छुपाकर जमानत पाई, जबकि बाद में चुनावी हलफनामे में विरोधाभासी जानकारी दी। उन पर दो आपराधिक मामले विचाराधीन हैं।
नई सरकार के लिए सबसे बड़ी challenge महिलाओं का trust बनाए रखना होगी, जो नीतीश कुमार की ‘कोर वोटर’ थीं। सरकारी नौकरियों में आरक्षण, लड़कियों को साइकिल देना, सुरक्षा के उपाय — इन सभी के भविष्य पर सवाल उठ रहे हैं। विश्लेषक मानते हैं कि भाजपा अभी भी अपने दम पर बिहार में प्रमुख ताकत नहीं बन पाई है। बिना जदयू के, उसकी सीटें 2015 में केवल 53 रह गई थीं। इसलिए सम्राट के leadership में भाजपा की स्थापना अभी एक big question है।
महिलाओं के लिए साइकिल योजना नीतीश की सबसे popular लोकप्रिय योजना थी। क्या नया CM इसे जारी रखेगा?
ये सब power game सत्ता का खेल है। कोइरी वोट के नाम पर एक नेता को ऊपर उठाया गया है। असली impact प्रभाव जनता पर क्या पड़ेगा?
सम्राट पर आपराधिक मामले हैं और उम्र को लेकर दोहराव है। क्या ये transparency पारदर्शिता के खिलाफ नहीं है?
हर नया नेता योगी मॉडल की नकल करता है। बिहार में वो copy-paste नकल काम नहीं करेगी।
नीतीश के जाने से महिलाओं की safety सुरक्षा पर serious doubt गंभीर संदेह है। क्या नई सरकार उनकी चिंताओं को लेगी?
सम्राट के पास जनता के बीच connect जुड़ाव नहीं है। क्या एक backroom decision पीठ के फैसले से लंबे समय तक सरकार चलेगी?