सात सांसदों का जाना: मीम्स ने बनाया 'प्लेसमेंट' का त्योहार
दिल्ली के सांसदों के एक साथ दल बदलने का दृश्य अब तक के political इतिहास में शायद ही कभी देखा गया हो। लेकिन जब सात आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सदस्यों ने भाजपा का दामन थाम लिया, तो यह घटना सिर्फ समाचारों में नहीं, बल्कि social मीडिया के मंचों पर भी तूफान ला दिया। राघव चड्ढा के शुक्रवार को ऐलान करते ही इंटरनेट तुरंत comedy जोन में तब्दील हो गया, जैसे कोई बड़ी रिलीज़ हो गई हो। लोगों ने memes की बाढ़ ला दी, मानो इंतजार सिर्फ एक बहाने का था।
कुछ यूज़र्स ने चुटकी लेते हुए कहा कि आखिरकार placement हो गई — एक ऐसा शब्द जो पहले कैंपस इंटरव्यू तक सीमित था, अब राजनीतिक उथल-पुथल में भी घुस गया है। एक मशहूर मीम में क्लासरूम का दृश्य दिखाया गया, जहां एक छात्र गर्व से घोषणा करता है कि उसका dream पैकेज मिल गया। इसे तुरंत सांसदों पर चिपका दिया गया। लोगों ने मज़ाक में कहा, 'अब ये लोग भी अपना package सील कर चुके हैं।' हर कोई जानता है कि राजनीति में स्थानांतरण कभी सिर्फ विचारधारा नहीं होता — वहां timing और तौकड़े भी चलते हैं।
दूसरों ने 'वॉशिंग मशीन' के रूप में भाजपा की तुलना कर डाली — एक ऐसा उपकरण जो राजनीतिक छवियों को clean करके निकालता है। इस तरह के चुटकले सिर्फ मनोरंजन नहीं करते, बल्कि एक public भावना का आईना भी हैं। जहां राजनीति में वफादारी को ऊंचा दर्जा दिया जाता है, वहीं आज के दौर में त्वरित पार्टी बदलाव उसे ठट्ठे का पात्र बना रहे हैं। इंटरनेट की भाषा में, यह सब एक viral कल्चर है, जो गंभीरता को हल्के में उड़ा देता है।
यह भी सच है कि इन मीम्स के पीछे सिर्फ हास्य नहीं, बल्कि एक निराशा भी छिपी है। जब जनता देखती है कि चुने हुए प्रतिनिधि बिना किसी झिझक के रंग बदल रहे हैं, तो वह अपने आप को विश्वासघात का शिकार महसूस करती है। मीम्स एक ऐसा हथियार हैं जो निराशा को humor में ढाल देते हैं। इस बार तो यहां तक कहा जा रहा है कि अब पार्टी छोड़ने वालों के लिए exit इंटरव्यू भी होना चाहिए — जैसे कॉर्पोरेट दुनिया में होता है।
सोशल मीडिया ने दिखा दिया है कि गंभीर राजनीति भी अब digital दुनिया के स्वाद में बदल रही है। जहां एक तरफ दलगत दुश्मनी बढ़ रही है, वहीं दूसरी ओर आम आदमी अपने screen पर मीम्स शेयर कर अपनी बात कह रहा है। यह नहीं कि सभी मज़ाक उड़ा रहे हैं — कुछ गहरे सवाल भी पूछ रहे हैं। वफादारी कहां गई? सिद्धांत कहां बिक रहे हैं? और क्या अब राजनीति भी corporate बर्ताव की तरह बन गई है?
प्लेसमेंट हो गई तो ठीक है, लेकिन internship इंटर्नशिप का क्या हुआ? क्या अब चुनाव से पहले ट्रेनिंग होगी?
वॉशिंग मशीन वाला मीम तो गोल्डन था। एक क्लिक, और सारे झंझट धुल गए।
मज़ाक बनाना आसान है, लेकिन क्या लोकतंत्र को इस तरह हल्के में लिया जाना चाहिए?
सबकुछ वायरल हो गया, लेकिन कोई बताएगा कि इन सांसदों ने अपने constituency निर्वाचन क्षेत्र के लोगों को क्या कहा?
एक बार फिर साबित हुआ कि यहां सिर्फ डील मायने रखती है, विचार नहीं।
अगला मीम: 'सर्विस टैक्स इंक्लूडेड'। क्योंकि पैकेज में कुछ छुपा तो होगा ही।