भूखे भजन नहीं: जब संस्कृति बन जाए अर्थव्यवस्था
कला के लिए पहले रोटी का इंतजाम होना जरूरी है—यही सच्चाई कबीरदास ने अपनी पंक्तियों में छुपा दी थी: hunger भजन न होइ गोपाला। जब तक जीवन की basic जरूरतें पूरी न हों, संस्कृति का आनंद लेना सिर्फ कुछ विशेषाधिकार प्राप्त लोगों के लिए संभव हो पाता है। लेकिन अब, आजादी के 75 साल बाद, भारत उस स्थिति में आ चुका है जहाँ सांस्कृतिक गतिविधियाँ सिर्फ विलासिता नहीं, बल्कि एक अर्थव्यवस्था भी बन सकती हैं। इसे अब 'ऑरेंज इकोनॉमी' के नाम से जाना जा रहा है—एक ऐसा मॉडल जहाँ art , साहित्य और परंपरा आर्थिक growth का हिस्सा बनते हैं।
यह सिर्फ दिल्ली या मुंबई तक सीमित नहीं रहा। cities जैसे जयपुर, इंदौर, कोच्चि, लखनऊ, पटना और चंडीगढ़ इस नई लहर के केंद्र बन रहे हैं। ये स्थानीय विरासत को मुख्यधारा में ला रहे हैं, और इस प्रक्रिया में रोजगार के अवसर पैदा कर रहे हैं। एक अनुमान के मुताबिक, यह क्षेत्र फिलहाल 45 लाख लोगों को काम दे रहा है। यह संख्या अकेले आंकड़ा नहीं—यह एक opportunity है, एक potential कि संस्कृति गरीबी से ऊपर उठकर आर्थिक शक्ति बन सकती है।
संस्कृति सिर्फ रोजगार तक ही सीमित नहीं है। यह एक देश की सॉफ्ट पावर भी है—वह ताकत जो तलवार से नहीं, बल्कि गीत, फिल्मों और दर्शन से दुनिया को जीतती है। फ्रांस की ancient संस्कृति यूरोप को झुकाए हुए है, और अमेरिका आज अपने वैश्विक प्रभाव को सिनेमा और संगीत से बढ़ा रहा है। जैसे रोम ने यूनान को हराया, लेकिन ग्रीक संस्कृति ने रोम पर कब्जा कर लिया, वैसे ही संस्कृति अंततः विजेता बनती है।
2047 तक भारत को एक विकसित राष्ट्र बनाना है। यह लक्ष्य सिर्फ आर्थिक विकास से नहीं, बल्कि सांस्कृतिक गौरव से पूरा होगा। देश के rural क्षेत्रों में छिपी कला, कलाकार, और आध्यात्मिक स्थल—ये सब tourism के जरिए दुनिया के सामने लाए जा सकते हैं। अगर हम इन्हें मुख्यधारा से जोड़ें, तो न सिर्फ आजीविका मजबूत होगी, बल्कि भारत की आत्मा भी दुनिया को दिखेगी।
संस्कृति को आर्थिक मॉडल बनाना अच्छी बात है, लेकिन कहीं यह व्यावसायीकरण में न बदल जाए।
हमारे गाँव में तो अभी भी कलाकारों को पहचान नहीं मिली। जब तक infrastructure बुनियादी सुविधाएँ नहीं आएँगी, यह अर्थव्यवस्था दूर की कौड़ी है।
ऑरेंज इकोनॉमी? नाम तो अच्छा है, लेकिन असली सवाल यह है कि क्या हम इसे वास्तविक बना पाएँगे?
खुशी की बात है कि छोटे शहर भी इस लहर में हैं। लेकिन क्या funding धन वास्तव में हम तक पहुँचेगा?
कबीर की पंक्ति आज भी उतनी ही प्रासंगिक है। संस्कृति का आनंद तभी है जब पेट भरा हो।
60 लाख लोग पारंपरिक कला के साथ जुड़े हैं—एक विशाल पारिस्थितिकी तंत्र है। इसे संरक्षित करना जरूरी है।
सॉफ्ट पावर का दीर्घकालिक असर होता है। अमेरिका ने हॉलीवुड से जो किया, भारत को भी वैसा ही सोचना चाहिए।
अच्छा लगा कि लेखक ने ग्रामीण स्तर की बात नहीं भूले। वहीं से तो असली tradition परंपरा आती है।