बातचीत पर संदेह! अमेरिकी डेलिगेशन पाकिस्तान जाने को तैयार, ईरान का शामिल होने से इनकार
अमेरिकी डेलिगेशन सोमवार को पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में दूसरे दौर की शांति वार्ता में भाग लेने के लिए रवाना होने वाला है, लेकिन इसी बीच ईरान ने अपनी participation से इनकार कर दिया है। ईरान की सरकारी न्यूज एजेंसी IRNA ने रविवार देर रात इस फैसले की घोषणा करते हुए कहा कि वह अमेरिका की 'अत्यधिक मांगों' और 'बार-बार रुख बदलने' के कारण वार्ता में नहीं आएगा। यह घटना उस समय आई है जब लगभग दो महीने से चल रहे संघर्ष के बीच लागू दो सप्ताह के अस्थायी ceasefire को आगे बढ़ाने की उम्मीद थी।
ईरान ने स्पष्ट रूप से अमेरिका के दृष्टिकोण को contradictory बताया है। प्रथम उपराष्ट्रपति मोहम्मद रजा आरिफ ने एक उच्चस्तरीय बैठक में कहा कि अमेरिका एक ओर बातचीत की बात करता है, लेकिन दूसरी ओर समुद्री नाकेबंदी जैसे दबाव बनाने वाले कदम उठा रहा है। उन्होंने कहा कि यह posture बचकानी और असंगत है। IRNA के मुताबिक, ईरान ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज और अपने बंदरगाहों पर अमेरिकी नौसेना की नाकेबंदी को युद्धविराम का सीधा violation माना है।
इसके विपरीत, व्हाइट हाउस ने पहले कहा था कि उपराष्ट्रपति जेडी वेंस, विशेष दूत स्टीव विटकॉफ और जेरेड कुशनर इस्लामाबाद जाएंगे। ये तीनों नेता पहले दौर की वार्ता में भी अमेरिका का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। डोनाल्ड ट्रंप ने रविवार को एक इंटरव्यू में कहा कि अमेरिकी वार्ताकार इस्लामाबाद पहुंचेंगे, जिससे 22 अप्रैल को समाप्त होने वाले युद्धविराम से पहले deal की उम्मीद जगी थी।
लेकिन अब ईरान के इस फैसले ने बातचीत की possibility को लगभग खत्म कर दिया है। ट्रंप ने अपने Truth Social पोस्ट में ईरान को सीधी चेतावनी दी है। उन्होंने दावा किया कि ईरान ने होर्मुज में फ्रांस और ब्रिटेन के जहाजों पर हमला किया, जिसे उन्होंने 'पूर्ण उल्लंघन' बताया। उनका कहना है कि अगर ईरान समझौते को ठुकराता है, तो अमेरिका उसके पुलों और पावर प्लांट्स पर हमला करेगा। उन्होंने कहा, 'अब और नरमी नहीं! अगर उन्होंने समझौता नहीं किया, तो जो करना जरूरी है, उसे करना मेरे लिए सम्मान की बात होगी।'
इस घटनाक्रम से क्षेत्र में तनाव और बढ़ने की आशंका है। ट्रंप ने यह भी कहा कि ईरान की कार्रवाई से होर्मुज के बंद होने से उसे रोजाना लगभग 500 मिलियन डॉलर का नुकसान हो रहा है। उन्होंने जोर देकर कहा कि अगर ईरान न्यायसंगत समझौते को नहीं स्वीकार करता, तो अमेरिका बड़े पैमाने पर military action करेगा।
अमेरिका बातचीत की बात करता है, लेकिन साथ ही धमकियाँ भी देता है। यह dual approach दोहरा रुख किसी समझौते को नहीं ला सकता।
ईरान के लिए यह बहुत बड़ा risk जोखिम है। अगर युद्ध फैलता है, तो पूरा क्षेत्र प्रभावित होगा।
ट्रंप की भाषा सदा से ही aggressive आक्रामक रही है। क्या वह सच में शांति चाहते हैं, या सिर्फ दबाव बनाना चाहते हैं?
अमेरिका बार-बार कहता है 'हम शांति चाहते हैं', लेकिन उसके actions कदम उसके शब्दों के विपरीत लगते हैं।
क्या वाकई 50 करोड़ डॉलर का नुकसान ईरान को हो रहा है? यह आंकड़ा कितना accurate सटीक है?
इस तरह की posturing मुद्रा से तो लगता है कि कोई वास्तविक बातचीत नहीं होने वाली।
पाकिस्तान इस बीच कैसे भूमिका निभा रहा है? क्या वह सच में तटस्थ है, या अपने interests हित भी देख रहा है?
अगर बातचीत विफल होती है, तो regional stability क्षेत्रीय स्थिरता को भारी नुकसान होगा।