ईरानी विदेश मंत्री फिर क्यों लौटे पाकिस्तान? कूटनीति का नया दौर शुरू?
वो तेहरान के आदमी थे जिन्होंने बातचीत के दरवाज़े खटखटाए, फिर खुद ही पीछे हट गए। talks के नाम पर एक दिन पहले इस्लामाबाद में मौजूद रहे ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल से मिलने से इनकार कर दिया — और फिर ओमान चले गए। इतना ही नहीं, उनके अपने दूत भी तेहरान चले गए, advice करने और निर्देश लेने के लिए। यह दृश्य ऐसा है जैसे कोई खिलाड़ी गेम शुरू होने से पहले ही ग्राउंड छोड़ दे, लेकिन फिर वापस आकर चुपचाप बैठ जाए। क्या ईरान अमेरिका से बात करने के लिए तैयार है, या सिर्फ एक strategy चला रहा है?
अब, अराघची वापस इस्लामाबाद में हैं — रविवार को वापस लौटे हैं। उनका लक्ष्य है: पाकिस्तानी अधिकारियों को ईरान के position से अवगत कराना, खासकर मध्य पूर्व में युद्ध को खत्म करने के लिए किसी समझौते के ढांचे पर। हालांकि, कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है। कोई नहीं जानता कि बातचीत कब और कैसे शुरू होगी। लेकिन एक tension जरूर है — वह जो कूटनीति के हर कदम में छिपा होता है, जहां एक शब्द न बोलना भी बयानबाजी हो सकती है।
इस बीच, अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बातचीत के लिए भेजे गए दूतों की यात्रा रद्द कर दी। उनका कहना था कि waste करने का कोई मतलब नहीं, खासकर जब ईरान की ओर से स्पष्ट संकेत नहीं मिल रहे। लेकिन उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि तेहरान ने उनके फैसले के कुछ ही मिनटों बाद अपने प्रस्ताव में बदलाव कर दिया। यह बदलाव क्या था? यह कैसे बातचीत के रास्ते को साफ कर सकता है? कोई नहीं जानता। लेकिन यह स्पष्ट है कि दबाव के खेल में, timing सब कुछ है।
इस्लामाबाद में, अराघची ने पाकिस्तान के सेना प्रमुख आसिम मुनीर, प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और विदेश मंत्री इशाक डार से मुलाकात की। उन्होंने यह भी कहा कि उनकी यात्रा beneficial रही, लेकिन अमेरिका के इरादों को लेकर उनके मन में doubt है। कूटनीति के इस खेल में, जहां एक शक भी बातचीत को धराशायी कर सकती है, वह धीमे स्वर में कह रहे हैं: 'अभी यह देखना बाकी है कि क्या अमेरिका सचमुच गंभीर है।' यह न केवल एक सवाल है, बल्कि एक warning भी है।
ईरान और अमेरिका के बीच युद्धविराम चल रहा है, लेकिन conflict पूरी तरह खत्म नहीं हुआ। जमीन पर शांति हो सकती है, लेकिन वार्ता के मेज पर अभी भी तनाव है। अराघची की लगातार आवाजाही — पाकिस्तान, ओमान, तेहरान — यह नहीं दिखाती कि बातचीत आसान होगी। यह दिखाती है कि कूटनीति एक ऐसी रेस है जहां हर पड़ाव एक गणना होती है। और अब सभी की निगाहें इस्लामाबाद पर हैं — क्या यही वह शहर होगा जहां दो दुश्मनों के बीच कोई समझौता होगा?
क्या वाकई ईरान बातचीत के लिए तैयार है या सिर्फ tactics रणनीति चला रहा है?
ट्रंप ने यात्रा रद्द की, लेकिन फिर क्यों मान लिया कि ईरान ने अपना रुख बदला? यह विरोधाभास नहीं है क्या?
पाकिस्तान एक बार फिर बीचवर्ती बनने की कोशिश में है। क्या यह वाकई neutral तटस्थ भूमिका निभा सकता है?
अराघची की शंका समझने योग्य है। अमेरिका के intentions इरादे हमेशा से अस्पष्ट रहे हैं।
ओमान और पाकिस्तान के बीच घूमते विदेश मंत्री — यह दिखाता है कि बातचीत के पीछे कितनी चालबाजी है।
कूटनीति में एक शब्द का भार हजार बमों से ज्यादा होता है। उम्मीद है शांति जीते।
हर बार यही होता है — बातचीत की उम्मीद, फिर निराशा। कब तक चलेगा यह खेल?
मुझे उम्मीद है कि इस बार बातचीत वास्तविक progress प्रगति लाएगी।