CM सम्राट चौधरी वाली कैबिनेट सूची बीजेपी ने लटकाई, अब नए सिरे से मंत्रियों पर विचार, विजय सिन्हा अकेले बड़ी चुनौती
बिहार की नई सरकार में मंत्रिमंडल विस्तार की कवायद अब political pressure के तहत चल रही है। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने भाजपा कोटे के मंत्रियों की सूची भेजी थी, लेकिन केंद्रीय नेतृत्व ने उसे खारिज कर दिया। अब सरकार के पहले बड़े policy decision पर सवाल उठ रहे हैं। कहा जा रहा है कि सूची में जातीय और क्षेत्रीय संतुलन का ध्यान नहीं रखा गया, जिसके कारण public trust पर खतरा मंडरा रहा है।
सूत्रों के मुताबिक, भाजपा के भीतर चार बड़े गुट सक्रिय हैं — नित्यानंद राय, विजय कुमार सिन्हा, सम्राट चौधरी और नितिन नवीन के नेतृत्व वाले। हर गुट अपने समर्थकों को मंत्री पद दिलाना चाहता है। इस internal conflict ने सरकार की छवि को कमजोर किया है। केंद्रीय नेतृत्व अब एक संतुलित cabinet list बनाने में जुटा है, ताकि कोई भी गुट नाराज न हो।
उपमुख्यमंत्री विजय कुमार सिन्हा की स्थिति विशेष चुनौती बन गई है। उनके बयानों में सीएम के प्रति समर्थन की कमी दिखी, जिसे भूमिहार समाज के असंतोष के रूप में देखा जा रहा है। अब सवाल यह है कि उन्हें कौन सा विभाग दिया जाए — क्या राजस्व एवं भूमि सुधार, जहां वे corruption control के चेहरे के रूप में उभरे, या कुछ और?
इस बीच, पार्टी प्रदर्शन के आधार पर भी मंत्रियों का चयन करने की बात कर रही है। जिनका काम ठीक नहीं रहा, उन्हें हटाया जा सकता है। साथ ही, young leadership को अवसर देने की चर्चा है। सम्राट चौधरी भी अपनी टीम में fresh faces को लाना चाहते हैं।
एक बड़ी चुनौती आयातित विधायकों को संतुलित करना है। अगर सिर्फ पुराने भाजपाइयों को मौका दिया गया, तो दूसरे दलों से आए नेता नाराज होंगे। लेकिन अगर नए लोगों को ज्यादा तरजीह मिली, तो पार्टी के अंदर internal dissatisfaction बढ़ेगा। भाजपा हाईकमान के सामने एक कठिन balancing act है, जहां हर फैसला एक राजनीतिक जोखिम बन सकता है।
मंत्रिमंडल का फैसला इतना देरी से क्यों? जनता को real change असली बदलाव चाहिए, न कि गुटबाजी के खेल।
विजय सिन्हा ने तो सीधे कमांडर का जिक्र करके political hypocrisy राजनीतिक दोहरापन दिखा दिया। अब उन्हें बड़ा विभाग चाहिए? कैसा न्याय है।
भूमिहार समाज का गुस्सा अनदेखा नहीं किया जा सकता। लेकिन क्या community appeasement समुदाय को खुश करना ही नीति बन जाएगी?
केंद्रीय नेतृत्व कोई quick decision तेजी से फैसला ले, वरना विपक्ष हर दिन इसे मुद्दा बनाएगा।
युवा मंत्री अच्छा है, लेकिन क्या वे effective governance प्रभावी शासन चला पाएंगे? अनुभव का भी महत्व है।
आयातित विधायकों को मंत्री बनाना पार्टी के संस्कृति को कमजोर कर सकता है। पुराने कार्यकर्ता क्यों नाराज न हों?