सूटकेस उठाए दौड़ रहे हैं ईरानी विदेश मंत्री: क्या शांति का दरवाजा खुलने वाला है?
एक suitcase उठाए घूम रहे ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची की दौड़ कहां जा रही है? इस्लामाबाद, मस्कट, और अब मॉस्को — ये शहर एक कूटनीति के नए नक्शे के निशान हैं। अराघची का सूटकेस लगातार पैक रहता है, जैसे कि उनकी नींद भी उसी में समा गई हो। वह पाकिस्तान जाते हैं, ओमान पहुंचते हैं, वापस इस्लामाबाद लौटते हैं, और फिर रूस के लिए उड़ान भरते हैं। ये सिर्फ एक travel नहीं, बल्कि एक अस्तित्व के लिए लड़ाई है। ईरान को एक सम्मानजनक निकास चाहिए, और वह उसके लिए हर channel को खोज रहा है।
इस खेल में ओमान एक भरोसेमंद messenger बना हुआ है। अराघची ने सुल्तान हैथम बिन तारिक से मुलाकात की, लेकिन उनकी टीम का एक हिस्सा वापस ईरान लौट गया — ताकि वहां की शीर्ष लीडरशिप को ताज़ा हालात की update दी जा सके। इस तरह का आदान-प्रदान दिखाता है कि ईरान के लिए यह सिर्फ एक वार्ता नहीं, बल्कि एक संकट का समाधान है। वह पाकिस्तान से रणनीतिक समर्थन चाहता है, ओमान से नाजुक संदेश पहुंचाने का माध्यम, और रूस से सुरक्षा परिषद में वीटो की ताकत।
दूसरी तरफ, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक मनोवैज्ञानिक दबाव बनाया है। उन्होंने अपने शांति दूतों का दौरा रद्द कर दिया, और कहा कि बिना नतीजे के वार्ता बेमानी है। फिर उन्होंने दावा किया कि रद्दीकरण के महज दस मिनट बाद ईरान ने एक बेहतर प्रस्ताव भेज दिया। चाहे यह सच हो या न हो, पर यह mind game दुनिया को दिखाने के लिए है कि कंट्रोल अमेरिका के हाथ में है। अराघची ने इस पर तंज कसा — क्या अमेरिका वास्तव में serious है या नहीं?
दबाव की वजह स्पष्ट है: होर्मुज का जलडमरूमध्य बंद है, जो दुनिया के तेल और गैस का सबसे महत्वपूर्ण रास्ता है। ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड्स ने साफ कह दिया है कि वे नाकेबंदी नहीं हटाएंगे। जवाब में अमेरिका ने ईरानी बंदरगाहों पर नाकेबंदी कर दी है। दोनों तरफ आर्थिक दमघोंटू हालत है। ऐसे में एक डील पर पहुंचने की जल्दी इसलिए है कि दबाव के बर्तन से पहले ही कोई समझौता हो जाए। तुर्की भी अपनी भूमिका बनाना चाहता है, और उसके विदेश मंत्री ने ईरान व अमेरिका दोनों से बात की है।
लेकिन एक और खेल भी चल रहा है — लेबनान के मोर्चे पर। वहां सीजफायर के बावजूद इजरायल ने हिजबुल्लाह पर हवाई हमले किए। छह लोग मारे गए। इससे जमीन पर tension बढ़ गया है। हिजबुल्लाह के नेता मोहम्मद राद ने शांति वार्ता से बाहर आने की मांग की है। यह साइड-शो मुख्य बातचीत को भी प्रभावित कर सकता है। सब तरफ एक शांति की डील तैयार हो रही है, लेकिन जमीन पर हिंसा अभी जारी है। सवाल यह है: क्या यह डील टिक पाएगी?
इतनी भागदौड़ के पीछे असली वजह आर्थिक दबाव है। ईरान टिक नहीं पाएगा लंबे समय तक।
क्या ट्रंप का '10 मिनट का दांव' सच में काम कर रहा है या बस एक propaganda प्रचार है?
ओमान की भूमिका बहुत गहरी है। वो सिर्फ messenger डाकिया नहीं, बल्कि एक समझदार खिलाड़ी है।
उम्मीद है कि यह बातचीत वास्तविक शांति लाएगी, न कि सिर्फ एक रुकावट।
होर्मुज बंद रहा तो दुनिया भर में पेट्रोल के दाम आसमान छू लेंगे।
हर देश अपना क्रेडिट लेना चाहता है — ये कूटनीति है या सिर्फ प्रतिष्ठा की लड़ाई?
जब तक लेबनान और इजरायल के बीच आग बुझ नहीं जाती, कोई ceasefire सीजफायर मजबूत नहीं हो सकता।
ओमान की शांति की भूमिका सचमुच सराहनीय है।