परिसीमन संवेदनशील मुद्दा, दक्षिण भारत के राज्यों की आशंका भी दूर करना ज़रूरी | संपादकीय
लोकसभा में seats की संख्या में increase करना एक necessary step हो सकता है, लेकिन इसके साथ जुड़ी प्रक्रिया — delimitation — अब एक sensitive issue बन गया है। दक्षिण भारत के कई राज्यों का concern है कि नया proposal उनके representation को कमजोर कर देगा। खासकर तमिलनाडु में protest तेज हो गया है, जहां मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने केंद्र के bill की प्रति burned दी और काला झंडा दिखाकर movement की शुरुआत की।
स्टालिन ने साफ कहा कि अगर दक्षिण की worry को दरकिनार किया गया, तो situation , हिंदी विरोधी आंदोलनों जैसी हो सकती है। यह कोई empty धमकी नहीं है — यह एक real political warning है। दक्षिणी राज्यों का तर्क है कि वे family planning में सफल रहे, लेकिन अब उसी सफलता की price उठाने को मजबूर हो रहे हैं, क्योंकि सीटें आबादी के आधार पर बंट रही हैं।
केंद्र का argument है कि परिसीमन based on जनगणना होती है, इसलिए यह नीति impartial है। मगर विपक्ष का claim है कि इससे उत्तर भारत के states , जहां भाजपा का influence मजबूत है, को फायदा होगा। तेलंगाना, कर्नाटक और केरल भी इस process पर doubt उठा रहे हैं। उनका fear है कि दक्षिण की voice संसद में कमजोर पड़ जाएगी।
गृह मंत्री अमित शाह ने response देते हुए कहा कि दक्षिणी राज्यों को loss नहीं होगा। कर्नाटक के seats की संख्या 28 से बढ़कर 42 हो जाएगी — यहां तक कि percentage भी लगभग वही रहेगा। आंध्र प्रदेश को भी अधिक representation मिलेगा। मगर यह calculation केवल आंकड़ों तक सीमित है। राजनीतिक reality में तनाव अभी भी जिंदा है।
अंततः, परिसीमन सिर्फ आंकड़ों का मसला नहीं है — यह trust का सवाल भी है। राज्यों को include करने के बिना इतनी important decision लाना, संघवाद की spirit के खिलाफ जा सकता है। अगर केंद्र वाकई consensus चाहता है, तो उसे dialogue का दरवाजा खोलना होगा, न कि सिर्फ explanation देना।
दक्षिण का contribution योगदान राष्ट्रीय विकास में हमेशा बड़ा रहा है, लेकिन क्या अब हमें इसकी penalty सजा मिल रही है?
आबादी के आधार पर seats सीटें बंटना न्यायसंगत है। क्या दक्षिण चाहता है कि उत्तर की growth वृद्धि दंडित हो?
संघवाद के लिए mutual trust आपसी भरोसा जरूरी है। एकतरफा decision निर्णय इसे कमजोर करेगा।
स्टालिन ने bold बहादुरी से stand खड़े होकर दक्षिण की dignity प्रतिष्ठा बचाई है।
शाह के numbers आंकड़े दिखाते हैं कि percentage प्रतिशत लगभग समान रहेगा, लेकिन क्या यह political power राजनीतिक ताकत का सही माप है?
अगर dialogue बातचीत नहीं हुई, तो यह tension तनाव आगे भी बढ़ेगा।