जेल से बाहर, लेकिन जंग अभी खत्म नहीं: मेहराज मलिक का आक्रामक वापसी
जब मेहराज मलिक कठुआ जेल के लौह द्वार से बाहर कदम रखते हैं, तो उनकी आँखों में न तो कोई क्रोध है, न ही थकान। बस एक अधर पर तिरछी मुस्कान है, और एक संकल्प — कि आठ महीने की निर्मम detention ने उन्हें नहीं तोड़ा। जम्मू के रिहाड़ी में उनके सरकारी आवास पर जनसैलाब के बीच वे घोषणा करते हैं: जेल भेजने वाले हार गए, मैं जीत गया। यह सिर्फ एक राजनीतिक बयान नहीं, बल्कि एक symbolic विद्रोह है — जिसमें अधिकारों की बात है, न्याय की धीमी गति की, और वादों के बंटवारे की।
उनका निशाना सीधा है — पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के एक मात्र tweet पर। जब वे जेल में थे, तब कहां थे आपके आंदोलन? उनका सवाल है: जरूरत के वक्त चुप रहने वालों से क्या उम्मीद करें? उमर का ट्वीट, जिसमें उन्होंने पीएसए के दुरुपयोग को अनुचित बताया, मेहराज के लिए काफी नहीं। उनके लिए ट्वीटर की दुनिया में शब्द छोड़ना और जमीन पर आंदोलन न करना — दोनों में आसमान-पृथ्वी का अंतर है। यह न सिर्फ एक जवाब है, बल्कि एक आलोचना है उस सिस्टम की, जहां राजनीति ट्वीट तक सीमित रह जाती है।
मेहराज ने जम्मू-कश्मीर की अर्थव्यवस्था के बारे में भी बोला। अगर दिल्ली में free बिजली, पानी और बस सेवा संभव है, तो यहां क्यों नहीं? यह सवाल सिर्फ आप के घोषणा पत्र तक नहीं जाता, बल्कि सरकार के resource के बहाने को चुनौती देता है। उन्होंने temporary कर्मचारियों के नियमितीकरण का मुद्दा उठाया और आरोप लगाया कि सरकार ने टोल प्लाजा खोलकर एक mafia कायम किया है। यह नाराजगी सिर्फ व्यक्तिगत नहीं, बल्कि जनता के लिए बोली गई लड़ाई की आवाज है।
जेल के अंदर की बात लाते हुए उन्होंने कहा कि वहां innocent और दोषी दोनों एक साथ बंद हैं। जब तक दोषी को जल्द न्याय नहीं मिलता, तब तक justice का अर्थ ही घट जाता है। अगर सजा तय होने में दस-ग्यारह साल लग जाएं, तो क्या वह न्याय है या एक ढोंग? उनकी बात न्यायिक प्रणाली की धीमी गति के बारे में नहीं, बल्कि उसके human प्रभाव के बारे में है। एक निर्दोष व्यक्ति का आठ महीने जेल में बिताना उसके जीवन के आठ महीने छीनने के बराबर है।
अब सवाल यह है कि क्या मेहराज की वापसी सिर्फ एक विधायक की वापसी है, या एक political भूचाल की शुरुआत? उनके समर्थकों के उत्साह में एक पुनरुत्थान की चमक है। लेकिन राजनीति में जीत और हार के पल अक्सर धुंधले होते हैं। जो जेल भेजने आए थे, वे हारे या नहीं — इतिहास तय करेगा। लेकिन आज, मेहराज मलिक के लिए, moment उनका है।
अगर ट्वीट से कुछ नहीं होता, तो मीडिया और नेता क्यों करते हैं? platform यह एक मंच है, न कि जुगाड़।
मुफ्त बिजली के मुद्दे पर वह सही है। दिल्ली में हो सकता है, तो यहां क्यों नहीं? यह संभव है, बस इच्छाशक्ति चाहिए।
एक निर्दोष व्यक्ति को आठ महीने जेल में रखना अन्याय है, चाहे कोई भी वजह हो।
क्या सच में सरकार टोल प्लाजा खोलकर revenue राजस्व बढ़ा रही है या लोगों को परेशान कर रही है?
मेहराज की बातों में तर्क है, लेकिन क्या वह आंदोलन बना पाएंगे या सिर्फ बयानबाजी तक सीमित रहेंगे?
हर रिहाई के बाद यही बातें — जेल भेजने वाले हारे, हम जीते। लेकिन जवाबदेही कब तय होगी?
उम्मीद है कि अब जेल में फंसे बाकी लोगों के लिए भी आवाज उठेगी, न सिर्फ एक विधायक के लिए।
सरकार को चाहिए कि वह न्यायिक प्रक्रिया को तेज करे, न कि delay देरी से नागरिकों का जीवन बर्बाद करे।