जब लोकतंत्र लड़खड़ाया: 45 सरकारों का पतन और 'आया राम' का जुमला

1967 से 1971 के बीच भारत ने democracy के एक ऐसे अंधकार युग को देखा, जब राजनीति के ताश के पत्तों की तरह गिरते थे। इस समयावधि में केवल चार साल में 45 state सरकारें अस्त-व्यस्त हुईं, और instability इतनी गहरी हो गई कि आम नागरिक के मन में भी सवाल उठने लगे—क्या भारतीय politics बच पाएगी? यह वह दौर था जब कांग्रेस का एकाधिकार टूटा, गठबंधन बने, और विचारधाराओं के बजाय power की भूख ने सबको निगल लिया।

इस अव्यवस्था के दौर में, दलबदल एक नियम बन गया था। 1800 से अधिक विधायकों ने अपने party छोड़े, और हर आठवें दलबदलू को मंत्री पद मिला। यहाँ तक कि करीब 115 ऐसे defector थे जिन्हें पार्टी छोड़ने के बदले मंत्री बनाया गया। इस खरीद-फरोख्त को देखकर तत्कालीन गृह मंत्री वाई बी चव्हाण ने 1968 में एक समिति बनाई, जिसने दलबदल को लोकतंत्र के लिए खतरा बताया। इस दौर में उत्तर भारत के राज्यों में coalition सरकारें बार-बार गिरीं, और विचारधाराओं के टकराव ने उनकी नींव हिला दी।

हरियाणा इस अस्थिरता का केंद्र बना। 1967 में कांग्रेस की सरकार महज एक सप्ताह चली। राव बीरेंद्र सिंह ने विधायकों का समूह तोड़कर 'विशाल हरियाणा पार्टी' बनाई और मुख्यमंत्री बन गए। उसी दौर में विधायक गया लाल ने नौ घंटे में तीन बार पार्टी बदली—एक घटना जिसने दलबदल के लिए 'आया राम, गया राम' का phrase प्रसिद्ध किया। बिहार में 1967 से 1971 के बीच नौ बार मुख्यमंत्री बदले गए। उत्तर प्रदेश में एक सरकार केवल 18 दिन चली। यह सब इसलिए कि loyalty की जगह लालच ने ले ली थी।

केंद्र सरकार ने भी राज्यों में राजनीतिक उथल-पुथल में भूमिका निभाई। कांग्रेस ने governor के जरिए विपक्षी सरकारों को अस्थिर किया और 16 बार राष्ट्रपति शासन लगाया गया। पंजाब, पश्चिम बंगाल और मध्य प्रदेश में भी यही कहानी दोहराई गई। मध्य प्रदेश में राजमाता विजयाराजे सिंधिया ने दलबदल का नेतृत्व किया। इन सभी घटनाओं ने दलबदल को एक संक्रामक बीमारी की तरह फैलाया, जहाँ एक विधायक के जाने से सरकार ढह जाती थी।

लोग थक चुके थे। इसी थकान ने 1971 में इंदिरा गांधी को भारी majority दिलाया। 'गरीबी हटाओ' के नारे के साथ एक मजबूत केंद्र की मांग उभरी। चव्हाण समिति की सिफारिशों के बाद, 1985 में राजीव गांधी की सरकार ने दलबदल विरोधी कानून पेश किया। 2003 में इसमें संशोधन कर 91वें संविधान संशोधन द्वारा मंत्रिमंडल का आकार 15 प्रतिशत तक सीमित किया गया। आज जब AAP के 7 सांसदों ने पार्टी छोड़ी, तो वही पुराना सवाल लौट आया—क्या history दोहराया जा रहा है?

प्रतिक्रियाएँ 8

  • संविधान_रक्षक

    कानून तो है, लेकिन प्रवर्तन कहाँ है? आज भी दलबदल हो रहा है।

  • पुराने_जमाने

    मैंने 70 के दशक में यह सब देखा। 'आया राम, गया राम' अब फिर से चल रहा है।

  • तथ्यवादी

    दिलचस्प है कि defectors में से हर आठवें को मंत्री पद मिला।

  • राजनीति_विश्लेषक

    इंदिरा गांधी को बहुमत मिला क्योंकि लोग stability चाहते थे, न कि नाटक।

  • युवा_आवाज

    क्या दलबदल विरोधी कानून अब बेकार है?

  • इतिहास_प्रेमी

    सुभाष सी कश्यप की किताब इस पूरे दौर को बहुत सटीक बताती है।

  • आलोचक

    केंद्र ने राज्यों को नष्ट किया। राज्यपाल tool बन गए।

  • प्रगतिशील

    लोगों को अपने विधायकों के विश्वासघात पर सवाल उठाना चाहिए।

यह लेख तथ्यों पर आधारित है और अंग्रेज़ी सीखने के लिए पुनर्रचित किया गया है; पाठक प्रतिक्रियाएँ विविध दृष्टिकोणों के उदाहरण हैं।

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