जस्टिस राजेश बिंदल की सेवानिवृत्ति: न्याय प्रणाली में तकनीकी नवाचार का मशालबरदार
सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस राजेश बिंदल ने बुधवार को अपनी न्यायिक यात्रा के शानदार समापन के साथ सेवानिवृत्ति ले ली। अपने लंबे कार्यकाल में, जस्टिस बिंदल ने न्याय प्रणाली में तकनीकी innovation लाने और मुकदमों के त्वरित resolution के लिए खास पहचान बनाई। उनके नेतृत्व में कई digital systems का विकास हुआ, जिन्होंने अदालतों के कामकाज में efficiency लाने में अहम भूमिका निभाई।
जस्टिस बिंदल ने साल 1985 में वकालत की शुरुआत की थी और पंजाब व हरियाणा हाईकोर्ट में अपना करियर आरंभ किया। 2006 में वह उसी अदालत के न्यायाधीश बने। उन्होंने indirect tax मामलों में गहरी expertise विकसित की और जटिल मामलों के निपटारे में अपनी reputation बनाई। उनके कार्यकाल में, वे पंजाब-हरियाणा, जम्मू-कश्मीर, कलकत्ता और इलाहाबाद हाईकोर्ट में सेवा दे चुके हैं।
उनके सबसे महत्वपूर्ण योगदानों में से एक था 'मुकदमा प्रबंधन प्रणाली', जिसे हरियाणा में सरकारी मुकदमों के लिए विकसित किया गया। इस प्रणाली ने case tracking को सरल बनाया और बाद में पंजाब, उत्तर प्रदेश और जम्मू-कश्मीर में अपनाई गई। उन्होंने software applications विकसित करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जैसे मेडिको-लीगल जांच और पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट प्रणाली, जो पंजाब, हरियाणा और चंडीगढ़ में शुरू हुई और अब पूरे देश में लागू करने की योजना है।
जस्टिस बिंदल को फरवरी 2023 में सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश के रूप में पदोन्नत किया गया था। वह राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण की एक समिति के सदस्य भी रहे, जिसका उद्देश्य लोक अदालतों और मध्यस्थता को अधिक प्रभावी बनाना था। उनके नेतृत्व में चंडीगढ़ ज्यूडिशियल एकेडमी के साथ-साथ कई तकनीकी समितियों का भी नेतृत्व किया गया। उनके दृष्टिकोण ने न्याय प्रणाली में transparency और त्वरित न्याय तक पहुँच को बढ़ावा दिया।
हरियाणा के अंबाला में 16 अप्रैल 1961 को जन्मे जस्टिस बिंदल ने कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय से एलएलबी की डिग्री हासिल की। उनके सेवानिवृत्ति समारोह में सहयोगी न्यायाधीशों ने उनके integrity , तेजस्विता और तकनीकी दूरदृष्टि के लिए श्रद्धांजलि दी। उनका योगदान भारतीय न्याय प्रणाली के आधुनिकीकरण में एक महत्वपूर्ण अध्याय के रूप में याद किया जाएगा।
तकनीक के जरिए मुकदमों का faster resolution तेज़ निपटारा अब जरूरी है। जस्टिस बिंदल ने इस दिशा में अच्छा काम किया।
लेकिन क्या सभी राज्य वाकई इन डिजिटल प्रणालियों को सही तरीके से implement लागू कर पा रहे हैं? कुछ जगह तो सिर्फ फाइलें डिजिटल हो रही हैं, असली बदलाव नहीं।
मैंने उनके सामने कई मामले लड़े। बहुत sharp mind तेज दिमाग वाले न्यायाधीश थे। सवाल पूछते थे तो लगता था कि पूरा केस पहले ही पढ़ लिया है।
मेडिको-लीगल रिपोर्ट सिस्टम जैसी पहल जान बचा सकती है। अब डॉक्टर और अदालत एक secure platform सुरक्षित मंच पर जुड़ सकते हैं।
सुप्रीम कोर्ट में सिर्फ दो साल? इतनी कम अवधि में कोई बड़ा impact प्रभाव डालना मुश्किल था। लेकिन हाईकोर्ट में उनका काम वाकई अच्छा रहा।
न्याय के लिए तेज निपटारा जरूरी है, लेकिन fairness न्याय कभी जल्दबाजी में नहीं होना चाहिए। उन्होंने दोनों का संतुलन बनाए रखा।