चीन का नया सैन्य प्लान, क्यों बनाना चाहता है 358 Missile जैसे सस्ते और घातक हथियार
चीन के सैन्य विशेलेषक अब एक नए रणनीतिक मोड़ की ओर इशारा कर रहे हैं: मिलिट्री प्लान में सस्ते लेकिन घातक हथियारों को प्राथमिकता देना। ईरान की 358 मिसाइल ने अमेरिकी MQ-9 ड्रोन जैसे महंगे उपकरणों को निष्प्रभावी कर दिया है, जिससे चीन में भी ऐसे हथियार विकसित करने की मांग तेज हो गई है। यह रुख न केवल लागत-दक्षता पर ध्यान करता है, बल्कि आधुनिक युद्ध में asymmetric warfare के नए माहौल को भी दर्शाता है।
ईरान की इस मिसाइल को SA-67 के नाम से भी जाना जाता है, जो subsonic speed से उड़ान भरती है और लगभग 100-150 किमी तक लक्ष्य का पीछा कर सकती है। इसका इंफ्रारेड सीकर लक्ष्य का पता लगाने में सक्षम है, जबकि इसका छोटा इंजन कम इन्फ्रारेड सिग्नेचर छोड़ता है, जिससे ड्रोन या लड़ाकू विमानों के लिए इसका पता लगाना मुश्किल हो जाता है। एक चीनी विशेषज्ञ ने इसे hidden arrow बताया है, जो शक्तिशाली लेकिन अदृश्य खतरा बन सकता है।
हालांकि, इस मिसाइल की अपेक्षाकृत धीमी गति Mach 0.6 को एक बड़ी कमजोरी माना जाता है। पारंपरिक वायु रक्षा मिसाइलें अक्सर Mach 3 से तेज उड़ती हैं, जिससे यह स्पष्ट होता है कि 358 मिसाइल जेट विमानों के खिलाफ कम प्रभावी हो सकती है। फिर भी, इसकी low cost — पारंपरिक मिसाइलों की तुलना में केवल दसवां हिस्सा — इसे ड्रोन युद्ध में एक आकर्षक विकल्प बनाती है।
अमेरिकी वायु सेना को 'ऑपरेशन एपिक फ्यूरी' के दौरान 24 MQ-9 ड्रोन खोने के कारण 720 मिलियन डॉलर का नुकसान हुआ। इसके विपरीत, एक 358 मिसाइल की लागत केवल 30,000 से 90,000 डॉलर अनुमानित है। यह cost imbalance चीन के लिए एक स्पष्ट सबक है: बड़े खर्चीले हथियारों के खिलाफ छोटे, सस्ते हथियार भी तबाही मचा सकते हैं।
चीन पहले ही ईरानी शाहेद-136 ड्रोन से प्रेरित होकर अपने सस्ते 'फ़ेइलॉन्ग-300D' ड्रोन विकसित कर चुका है, जिसकी कीमत केवल 10,000 डॉलर है। अब यह स्पष्ट है कि चीन modern warfare के नए नियमों को समझ रहा है और लंबे समय तक चलने वाले युद्ध, यानी attrition warfare , के लिए तैयारी कर रहा है। यह सिर्फ तकनीक नहीं, बल्कि strategic adaptation का मुद्दा है।
एक 720 मिलियन डॉलर के नुकसान के बदले केवल कुछ लाख डॉलर की मिसाइल खर्च करना — यही तो asymmetric advantage असममित लाभ है।
चीन के लिए यह सिर्फ copying नकल नहीं है, बल्कि एक strategic necessity रणनीतिक आवश्यकता है।
अगर छोटी मिसाइलें इतनी खतरनाक हैं, तो हमारे पास भी ऐसे defensive systems रक्षात्मक प्रणाली क्यों नहीं हैं?
इंफ्रारेड सिग्नेचर कम होना मतलब stealth capability स्टील्थ क्षमता — यही भविष्य का युद्ध है।
धीमी गति वाली मिसाइलें जेट विमानों के खिलाफ कैसे टिकेंगी? यह critical flaw महत्वपूर्ण कमी तो है।
लागत का ratio अनुपात देखकर दिमाग घूम जाता है — एक छोटी मिसाइल के बदले करोड़ों डॉलर का नुकसान।
शाहेद ड्रोन और 358 मिसाइल — दोनों ही low-cost warfare कम लागत वाले युद्ध के उदाहरण हैं। चीन इसे समझ चुका है।