LNG आयात: पश्चिम एशिया संकट से भारत की आपूर्ति रणनीति बदली, रूस-नॉर्वे समेत नए स्रोतों की तलाश तेज
पश्चिम एशिया में चल रहे crisis के बीच भारत की एलएनजी आपूर्ति रणनीति में बड़ा change आया है। अब भारत न केवल रूस और नॉर्वे जैसे नए स्रोतों की तलाश कर रहा है, बल्कि वर्षों बाद उनके साथ व्यापार भी फिर से शुरू करने जा रहा है। जहाज-ट्रैकिंग data और उद्योग सूत्रों के अनुसार, इस महीने रूस से दो साल बाद पहला एलएनजी कार्गो आने वाला है, जबकि नॉर्वे से सात साल बाद एक जहाज गुजरात के दहेज टर्मिनल पर पहुंचेगा।
इसके पीछे एक बड़ा कारण कतरएनर्जी द्वारा मार्च में force majeure घोषित करना था, जिसके बाद आयातकों ने वैकल्पिक स्रोतों की तलाश तेज कर दी। यूरोपीय संघ के रूस की यमल एलएनजी पर स्पॉट खरीद के प्रतिबंध लगाने के बाद भारत पर supply pressure बढ़ गया है। इस बीच, अफ्रीकी देशों से आपूर्ति तो शुरू हो गई है, लेकिन यह पश्चिम एशिया की तुलना में लगभग दोगुनी महंगी है और पहुंचने में अधिक time भी लगता है।
केप्लर के आंकड़ों के मुताबिक, भारत ने मार्च में 16.7 लाख टन एलएनजी आयात किया, जो फरवरी की तुलना में 13 फीसदी कम था। एक साल पहले के मुकाबले यह 16 फीसदी कम है। जनवरी में आयात 26 लाख टन था, जिसमें से आधा हिस्सा पश्चिम एशिया से आया था। अब कई औद्योगिक इकाइयां बंद पड़ी हैं, और सरकार ने सार्वजनिक तेल कंपनियों को अधिकतम एलएनजी खरीदने के निर्देश दिए हैं। इस प्रकार, आपूर्ति में गिरावट और demand के बीच एक नाजुक संतुलन बना हुआ है।
एक संवेदनशील मोड़ यह है कि रूस की पोर्टोवाया कंपनी, जिस पर अमेरिका ने प्रतिबंध लगा रखा है, उससे जुड़ा एक जहाज कुनपेंग इस महीने भारत के दहेज टर्मिनल पर आ सकता है। हालांकि, व्यापारियों का कहना है कि भारत आमतौर पर sanctioned fuel खरीदने से बचता है। फिर भी, यह संकेत देता है कि आपूर्ति के दबाव के चलते भारत अपनी पारंपरिक रुख में flexibility दिखा सकता है। यह न केवल ऊर्जा सुरक्षा, बल्कि वैश्विक बाजार में भारत के रणनीतिक वजन को भी दर्शाता है।
अफ्रीकी एलएनजी दोगुनी महंगी है? तो फिर बिजली और उर्वरक की कीमतों पर cost लागत का दबाव तो बढ़ेगा ही।
नॉर्वे से सीधे कनेक्शन अच्छी खबर है। लेकिन क्या यूरोप भी अब भारत की तरह एलएनजी बचाने लगेगा? market shift बाजार में बदलाव तेज हो रहा है।
कुनपेंग जहाज प्रतिबंधित नहीं है, लेकिन पोर्टोवाया से लदा है। यह खेल बहुत सूक्ष्म है। risk जोखिम कम नहीं है।
पश्चिम एशिया पर इतनी निर्भरता खतरनाक थी। अब नए स्रोतों की तलाश decision फैसला देर से हुआ, लेकिन सही है।
सरकार कह रही है कि प्रतिबंधित ईंधन नहीं लेंगे, लेकिन जहाज तो आ रहा है। क्या यह सिर्फ public statement सार्वजनिक बयान है?
मार्च में आयात 16.7 लाख टन? जनवरी के 26 लाख टन के मुकाबले यह बहुत गिरावट है। क्या demand drop मांग में गिरावट वास्तविक है या सप्लाई की कमी?