लांसडाउन का नाम बदलेंगे? विधायक बोले: पहले पर्यटन को सोचो
उत्तराखंड के hill शहर लांसडाउन में हवा बदल रही है — लेकिन हवा नहीं, बल्कि नाम बदलने की proposal ने बीजेपी के भीतर तनाव पैदा कर दिया है। लांसडाउन विधानसभा क्षेत्र के विधायक दिलीप रावत ने केंद्रीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह को पत्र लिखकर warned दी है: नाम बदला तो पर्यटन को नुकसान होगा। यह वही शहर है जो कोहरे में लिपटे ओक और रोडोडेंड्रोन के जंगलों से जन्मा, जिसे एक दिन 'लांसडाउन' नाम मिला — ब्रिटिश वायसराय के नाम पर। अब, उसकी पहचान को बदलने की कवायद पर स्थानीय आपत्ति तेज हो रही है।
विधायक का तर्क स्पष्ट है: लांसडाउन दुनिया भर के tourists के लिए एक जाना-माना नाम है। इसे बदलने से अर्थव्यवस्था पर बुरा असर पड़ेगा। उन्होंने कहा कि स्थानीय लोग इस प्रस्ताव के strongly खिलाफ हैं। शहर एक thriving पर्यटन केंद्र है, और उसकी global पहचान नाम के साथ जुड़ी है। नाम बदलने से न केवल भूगोल बदलेगा, बल्कि छवि भी धुंधली होगी।
लेकिन इतिहास भी चुप नहीं है। 1886 में, यह जगह एक dense जंगल थी, जिसे 'कालुंडांडा' कहा जाता था। ब्रिटिश अधिकारी जनरल मरे ने इसे छावनी के लिए उपयुक्त माना। और 1890 में, वायसराय लॉर्ड लैंसडाउन के नाम पर इसका नामकरण हुआ। आज, लांसडाउन छावनी बोर्ड civil सुविधाएं — पानी, बिजली, चिकित्सा, शिक्षा — देता है, जो स्थानीय जीवन की रीढ़ हैं। इस व्यवस्था को 'छावनी अधिनियम 2006' के तहत संचालित किया जाता है।
इस बीच, राज्य के दूसरे छोर पर, केदारनाथ यात्रा की तैयारियां जोरों पर हैं। जिलाधिकारी विशाल मिश्रा ने inspection के दौरान helicopter सेवाओं, सुरक्षा और बुनियादी ढांचे पर ध्यान केंद्रित किया। लेकिन लांसडाउन के मामले में, सवाल यह है: क्या पहचान बदलने से विरासत भी बदल जाएगी? क्या एक नाम सिर्फ एक नाम है, या एक इतिहास का नाम है?
लांसडाउन का नाम रखा गया तो ब्रिटिशकाल में, लेकिन अब यह हमारी culture संस्कृति का हिस्सा बन चुका है।
अगर नाम बदला, तो गूगल पर सर्च करने वाले पर्यटकों को क्या होगा? confusion उलझन तो होगी।
कालुंडांडा से लांसडाउन तक का सफर भी तो इतिहास है। क्या उसे पीछे छोड़ना सही होगा?
क्या यह नाम बदलने की चाल सिर्फ प्रतीकवाद के लिए है, या असली विकास पर ध्यान जाएगा?
हम लोग तो बस यह जानते हैं कि लांसडाउन में हमारी जमीन, जीवन और आजीविका है।
छावनी बोर्ड के कामकाज पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा, लेकिन public जनता की भावनाएं क्यों ठेस पहुंचाई जाएं?