लेबनान और इजरायल की 33 साल बाद पहली सीधी वार्ता: शांति की उम्मीद या सिर्फ एक दिखावा?
वॉशिंगटन में इजरायल और लेबनान के बीच हुई बातचीत ने historical महत्व ले लिया है। तीन दशकों के बाद यह पहली बार है जब दोनों देशों ने सीधी राजनयिक वार्ता की है। mediation अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो ने की, जिसका उद्देश्य इजरायल और हिजबुल्लाह के बीच चल रहे संघर्ष को end करना है। लगभग डेढ़ महीने से जारी बमबारी में 2,000 से अधिक लोग मारे जा चुके हैं, जिससे लेबनान में humanitarian crisis गहरा गया है।
यह वार्ता ऐसे समय हुई है जब ईरान और अमेरिका के बीच वार्ता के दूसरे दौर की तैयारी चल रही है। अमेरिकी विदेश विभाग ने कहा कि दोनों पक्ष agreed हुए हैं कि सीधी बातचीत आगे बढ़ेगी, जिसकी तारीख और जगह बाद में तय की जाएगी। अब तक दोनों देशों के बीच कोई औपचारिक diplomatic relations नहीं थे। आखिरी उच्च-स्तरीय वार्ता 1993 में हुई थी, जो अब तक का आधार नहीं रहा।
यूएस स्टेट डिपार्टमेंट के प्रवक्ता टॉमी पिगॉट ने बताया कि इजरायल और लेबनान दोनों ने हिजबुल्लाह के प्रभाव को कम करने पर सहमति व्यक्त की है। हिजबुल्लाह, जो लेबनान के दक्षिण और बेरूत के उपनगरों में मजबूती से स्थित है, ने इस बातचीत का rejected किया है और कहा है कि वह किसी भी agreement को मान्यता नहीं देगा।
लेबनान के राष्ट्रपति जोसेफ औन ने उम्मीद जताई है कि यह वार्ता लेबनानवासियों, खासकर दक्षिणी क्षेत्र के लोगों की suffering को कम करेगी। उन्होंने कहा कि लेबनानी सेना को उस क्षेत्र की full responsibility लेनी चाहिए। अमेरिका ने स्पष्ट किया कि वह इजरायल के स्वयं की रक्षा के अधिकार का समर्थन करता है।
हालांकि अमेरिका ने इसे एक positive step बताया है, लेकिन स्पष्ट किया है कि तुरंत कोई बड़ा समझौता नहीं होगा। दो घंटे की बातचीत के बाद भी, दोनों पक्षों के बीच अभी भी deep mistrust है, और शांति की राह में हिजबुल्लाह जैसे गुटों की भूमिका एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। फिर भी, इस बातचीत ने regional peace की उम्मीदों को जगा दिया है।
इतने साल बाद वार्ता हुई, लेकिन हिजबुल्लाह के बिना यह समझौता कितना टिकेगा? लगता है अमेरिका भी जानता है कि असली ताकत वही है।
2,000 से ज्यादा लोग मारे गए और अब बातचीत? यह तो बहुत कम और बहुत देर से है।
अमेरिका हर जगह मध्यस्थ बन रहा है, लेकिन क्या यह सच में impartial निष्पक्ष हो सकता है? इजरायल के प्रति उसका रुख तो साफ है।
लेबनान के लोगों की suffering तकलीफ तो असली है। उम्मीद है कि अब कम से कम बमबारी रुके।
हिजबुल्लाह का कहना है कि वे किसी deal समझौते को नहीं मानेंगे। फिर यह बातचीत किसके लिए है?
मानवीय संकट के बीच भी राजनीति चलती रहती है। कोई real solution वास्तविक समाधान तब तक नहीं मिलेगा जब तक जमीनी हालात को नहीं समझा जाएगा।