एक साल बाद भी खामोश पहलगाम: विदेश नीति पर सवाल
एक साल पहले के उस दिन की याद आज भी भारतीय दिलों में ताजा है, जब पहलगाम में terrorist हमले ने निरीह पर्यटकों के बीच खौफ का माहौल बना दिया था। कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने बुधवार को इस दुखद घटना की बरसी पर दुख जताते हुए कहा कि इस हमले से ठीक पहले पाकिस्तानी सेना प्रमुख आसिम मुनीर ने inflammatory बयान दिया था—एक स्पष्ट चेतावनी, जिसे नजरअंदाज किया गया। उन्होंने संतप्त स्वर में लिखा, ‘आज का दिन हर भारतीय के लिए pain और grief का है।’ एक स्थानीय युवा की उस बहादुरी को भी याद किया गया, जिसने एक पर्यटक को बचाने की कोशिश करते हुए अपनी जान गंवा दी।
लेकिन इस दुख के बीच, रमेश ने एक बड़ा diplomatic सवाल उठाया: कैसे वही देश, जो 2008 के मुंबई हमले के बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग-थलग पड़ गया था, आज एक नई global प्रतिष्ठा बना रहा है? उनके अनुसार, पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था अभी भी economy है और विदेशी अनुदान पर निर्भर है, फिर भी उसे एक अलग छवि मिल रही है। रमेश का आरोप है कि यह नई छवि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की foreign नीति की विफलता को उजागर करती है।
उन्होंने जम्मू-कश्मीर के उप राज्यपाल मनोज सिन्हा के उस admission का जिक्र किया, जिसमें उन्होंने पहलगाम हमले को intelligence विफलता माना था। लेकिन सवाल यह है कि इसके बाद क्या action हुई? रमेश ने कहा कि हालांकि हत्यारों को कुछ महीने बाद न्याय के कटघरे में लाया गया, लेकिन उस विफलता के लिए किसी को जवाबदेह नहीं ठहराया गया। यह failure सिर्फ एक घटना नहीं, बल्कि एक चौतरफा चुनौती का हिस्सा है।
रमेश ने पाकिस्तान की आंतरिक politics पर भी प्रकाश डाला—उनके अनुसार, वहां सेना ही असली power है, जबकि राजनीतिक ढांचा निष्क्रिय है। अलगाववादी activities समाज में गहराई तक फैली हुई हैं। फिर भी, उस देश को आज एक नया अंतरराष्ट्रीय image मिल रही है। इसे लेकर उन्होंने प्रधानमंत्री की राजनयिक शैली पर सवाल उठाए—उनकी आत्म-प्रशंसा वाली नीति के परिणामस्वरूप, भारत की विदेश नीति का प्रभाव कमजोर पड़ रहा है।
अंत में, रमेश ने एक सीधा question पूछा: क्या विदेश नीति में बदलाव की जरूरत है? ‘बिलकुल हां,’ उनका जवाब था। लेकिन फिर वह स्वयं ही जोड़ते हैं, ‘क्या प्रधानमंत्री ऐसा करेंगे? निश्चित रूप से नहीं।’ यह वाक्य उस निराशा को उजागर करता है, जो आज विपक्ष के मन में है—एक ऐसी नीति के प्रति, जो दिखावे पर ज्यादा, और परिणाम पर कम भरोसा करती है।
पहलगाम की घटना वाकई दिल दहला देने वाली थी। लेकिन क्या evidence सबूत है कि पाकिस्तान को असल में नई वैश्विक प्रतिष्ठा मिली है?
उस स्थानीय युवा को नमन। वीरता की ऐसी मिसाल देश को प्रेरित करती है।
मोदी जी के विदेश दौरों में तो धूम मचती है, लेकिन impact प्रभाव कहां है? यही सवाल है।
आतंकवाद के खिलाफ एकजुटता जरूरी है, लेकिन politics राजनीति उसे कमजोर कर रही है।
हर घटना के बाद विपक्ष सरकार पर निशाना साधता है, लेकिन समाधान क्या है?
पाकिस्तान आज भी आतंकवाद का घाटा है। उसे recognition मान्यता देना गलत है।
खुफिया विफलता के बाद जवाबदेही का सवाल वैध है।
हमें शांति चाहिए, लेकिन security सुरक्षा सबसे पहले।