योगी कैबिनेट विस्तार में अभी भी समय, पीएम मोदी के संबोधन के बाद यूपी में भाजपा ने बदली रणनीति
उत्तर प्रदेश में भाजपा ने अचानक अपनी रणनीति में shift करते हुए मंत्रिमंडल विस्तार के बजाय महिला आरक्षण के मुद्दे पर public focus केंद्रित करने का फैसला किया है। यह फैसला प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के राष्ट्र के नाम संबोधन के तुरंत बाद आया, जिसके बाद पार्टी के शीर्ष नेताओं ने आपस में बैठक कर pressure को महसूस किया कि अब समय आ गया है कि विपक्ष के खिलाफ एक जन-आंदोलन जैसा माहौल बनाया जाए।
पिछले कुछ दिनों से लगातार चल रही उच्चस्तरीय बैठकों के बावजूद, मंत्रिमंडल में expansion या प्रदेश संगठन के restructuring पर अभी कोई ठोस निर्णय नहीं लिया गया। प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी और महामंत्री धर्मपाल सिंह ने शनिवार को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मुलाकात कर इस मुद्दे पर गहन discussion की। इस बैठक में साफ हुआ कि पहली प्राथमिकता अब महिला आरक्षण विधेयक के विफल होने के खिलाफ public campaign छेड़ना है।
पार्टी का तर्क है कि सपा और कांग्रेस सहित अन्य विपक्षी दलों ने लोकसभा में नारी शक्ति वंदन संशोधन विधेयक (131वां संविधान संशोधन विधेयक) का विरोध कर betrayal किया है। पंकज चौधरी ने साफ कहा कि यह बिल महिलाओं को उनका संवैधानिक right देने के लिए लाया गया था, और अब देश की माताओं-बहनों को इस मुद्दे पर जागरूक करने की जरूरत है।
इस बीच, प्रधानमंत्री के संबोधन को पार्टी के विभिन्न नेताओं ने अलग-अलग स्थानों पर सुना। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अपने आवास पर, उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक ने महिलाओं के साथ अपने आवास पर, और प्रदेश नेतृत्व ने भाजपा मुख्यालय में बैठकर इसे सुना। यह तालमेल दिखाता है कि पार्टी एक सुसंगत response देने की तैयारी में है। अब सवाल यह है कि यह नई strategy चुनावी मोर्चे पर कितनी प्रभावशाली साबित होगी।
अब तक मंत्रिमंडल में बदलाव का इंतजार था, लेकिन लगता है पार्टी को political pressure राजनीतिक दबाव महसूस हो रहा है। महिला आरक्षण पर अभियान चलाना एक बुद्धिमानी भरा कदम हो सकता है।
क्या यह सच में महिलाओं के अधिकार के लिए है या सिर्फ एक tactical move रणनीतिक कदम? विपक्ष को घेरना तो दिख रहा है, लेकिन महिलाओं के लिए क्या वास्तविक support समर्थन है?
महिला आरक्षण के मुद्दे पर चुप्पी तोड़ना जरूरी था। अब देखना यह है कि क्या यह public trust जन भरोसा बहाल कर पाता है या फिर सिर्फ एक घोषणा तक सीमित रह जाता है।
सब कुछ दिखावे के लिए हो रहा है। आखिरकार, जनता को पता है कि असली decision फैसला दिल्ली में होता है, न कि लखनऊ में।
प्रधानमंत्री के संबोधन के बाद तुरंत प्रतिक्रिया देना दिखाता है कि पार्टी quickly तेजी से अपनी रणनीति बदल सकती है। लेकिन क्या यह बदलाव जनता तक effectively प्रभावी ढंग से पहुंचेगा?
महिला आरक्षण पर बहस तो जरूरी है, लेकिन इसे चुनावी tool औजार बनाने की कोशिश न हो जाए। नीति को राजनीति से ऊपर रखना चाहिए।