57 दिनों का डिजिटल अंधेरा: ईरान में इंटरनेट बंद कैसे तोड़ रहा है एक राष्ट्र की रीढ़
कल्पना कीजिए: एक पूरा देश, 8 करोड़ से अधिक आबादी, और 57 दिनों तक internet के बिना जीवन जी रहा है। ईरान में यह सच है। यह विश्व के किसी भी देश में अब तक का सबसे लंबा राष्ट्रव्यापी इंटरनेट बंद है। जहां एक ओर दुनिया तेजी से जुड़ रही है, वहीं ईरान के लोग अपने प्रियजनों के साथ बातचीत करने से भी वंचित हैं। shutdown ने न सिर्फ संचार को तोड़ा है, बल्कि आवाजों को भी दबा दिया है।
नेटब्लॉक्स ने स्पष्ट किया है कि यह disruption सिर्फ एक तकनीकी खराबी नहीं है — यह एक राजनीतिक कदम है। तेहरान पर 28 फरवरी को अमेरिका और इजरायल के संयुक्त attack के बाद यह बंद लागू किया गया। तब से ईरानी समाज अलग-थलग पड़ चुका है। लोगों के लिए न तो सोशल मीडिया तक पहुंच है, न ही ईमेल या वीडियो कॉल। community के साथ जुड़ाव टूट चुका है।
इस काले पड़दे के पीछे, अर्थव्यवस्था भी धीरे-धीरे ढह रही है। ऑनलाइन व्यापार लगभग ठप्प है। छोटे व्यवसायी, जो डिजिटल भुगतान और ऑनलाइन बाजारों पर निर्भर हैं, damage के चक्र में फंस गए हैं। economy के लिए यह बंद जहर का घूंट साबित हो रहा है। सरकारी आंकड़ों के बिना भी, निगरानी संस्थाओं का मानना है कि नुकसान अपरिवर्तनीय हो सकता है। flow रुकने से न सिर्फ जानकारी बाधित हुई है, बल्कि व्यापार भी।
इतिहास बयान करता है कि सरकारें आपातकाल में सूचना पर नियंत्रण रखना चाहती हैं। लेकिन इस बार, पैमाना इतना बड़ा है कि यह पहले के सभी प्रयासों को पीछे छोड़ देता है। यह कोई स्थानीय ब्लैकआउट नहीं — यह एक राष्ट्रव्यापी control का प्रयोग है। information के अधिकार के बजाय, लोग अंधेरे में जीने को मजबूर हैं। और दुनिया इस अंधेरे के बीच ईरान की आवाज सुनने की कोशिश कर रही है।
किसी देश को इंटरनेट से काटना आज के जमाने में communication संपर्क काटने जैसा है। यह मानवाधिकार का उल्लंघन नहीं तो और क्या है?
अगर ऐसा ही चलता रहा, तो ईरानी अर्थव्यवस्था को लंबे समय तक उबरने में लगेगा। डिजिटल दुनिया से कटाव का सीधा असर होता है।
क्या वाकई इंटरनेट बंद करने से सुरक्षा बढ़ती है? या बस आलोचना दबाने का तरीका है? security सुरक्षा और सेंसरशिप में अंतर होना चाहिए।
57 दिनों तक बिना इंटरनेट के जीना असंभव लगता है। यह तो डिजिटल निर्वासन है।
हम भारत में कभी-कभार नेट बंद देखते हैं, लेकिन राष्ट्रव्यापी स्तर पर? यह तो सोचा भी नहीं जा सकता।
लोगों को जानकारी से अलग रखना डरावना है। आखिर, voice आवाज दबाना और सच छिपाना एक जैसा है।
अर्थव्यवस्था पर असर तो साफ है, लेकिन मनोवैज्ञानिक असर क्या होगा? इतने दिन तक अलगाव में रहना भावनात्मक रूप से नष्ट कर देगा।
दुनिया के सामने ईरान की छवि अब और खराब होगी। निगरानी और खुलापन में तनाव बढ़ेगा।