'ईरान से इस्लामिक शासन को हटाकर रहेंगे', मोसाद प्रमुख का ऐलान, बोले- इजरायल का मिशन अभी अधूरा
इजरायल की खुफिया एजेंसी मोसाद के प्रमुख डेविड बार्निया ने साफ कहा है कि ईरान में उनका mission तब तक पूरा नहीं होगा जब तक तेहरान में वर्तमान इस्लामिक शासन को नहीं हटा दिया जाता। बार्निया ने मंगलवार को एक बयान में कहा कि इजरायल अपने campaign को रोकने का इरादा नहीं रखता, भले ही अमेरिका और ईरान बातचीत के जरिए तनाव कम करने की कोशिश कर रहे हों। उन्होंने कहा, 'हम तब तक वापस नहीं बैठेंगे जब तक यह कट्टरपंथी व्यवस्था बदल नहीं जाती।' यह घोषणा न केवल ईरान, बल्कि अमेरिका के लिए भी एक challenge के रूप में उभरी है।
बार्निया ने कहा कि 28 फरवरी से शुरू हुई 40-दिवसीय लड़ाई में इजरायल ने कई successes हासिल की हैं, जिसमें दुश्मन के महत्वपूर्ण लक्ष्यों को कमजोर करना शामिल है। उन्होंने जोर देकर कहा कि लड़ाई के दौरान इजरायली सेना के हमलों में मोसाद की भूमिका 'महत्वपूर्ण' थी। तेहरान पर 28 फरवरी के हमले में ईरान के सुप्रीम लीडर अली खामेनेई सहित कई शीर्ष नेता मारे गए थे, जिसके बाद 8 अप्रैल को एक दो-सप्ताह की युद्धविराम समझौते पर पहुँच पाई गई।
फिर भी, बार्निया ने स्पष्ट किया कि इजरायल का उद्देश्य केवल लड़ाई जीतना नहीं, बल्कि तेहरान में शासन का change लाना है। उन्होंने कहा, 'हमारा commitment तब पूरा होगा जब इस कट्टरपंथी शासन को बदल दिया जाएगा।' इस बयान से साफ है कि इजरायल न केवल सुरक्षा के मुद्दों पर ध्यान केंद्रित कर रहा है, बल्कि ईरान के राजनीतिक structure में हस्तक्षेप करने की लंबी अवधि की रणनीति बना रहा है।
अमेरिका अभी भी बातचीत के माध्यम से शांति स्थापित करने का प्रयास कर रहा है, लेकिन इजरायल के तेज रुख ने दोनों सहयोगियों के बीच तनाव पैदा कर दिया है। ट्रंप प्रशासन के लिए यह घटनाक्रम एक diplomatic जटिलता बन गया है, क्योंकि वे न तो इजरायल को नाराज करना चाहते हैं और न ही ईरान के साथ युद्ध की ओर बढ़ना चाहते हैं। इस बीच, खाड़ी क्षेत्र में तनाव अभी भी टिका हुआ है, और भविष्य में नए conflicts की आशंका बनी हुई है।
इस पूरे घटनाक्रम ने दुनिया भर में राजनीतिक चिंता बढ़ा दी है। यह न केवल क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए खतरा है, बल्कि वैश्विक ऊर्जा market और आर्थिक स्थिरता पर भी गहरा impact डाल सकता है। इजरायल के इस स्पष्ट और कठोर रुख ने यह संकेत दिया है कि वह अपनी सुरक्षा के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार है, भले ही इससे अंतरराष्ट्रीय pressure बढ़े।
इजरायल का यह फैसला तो बिल्कुल लापरवाही भरा है। क्या वे वाकई सोचते हैं कि एक विदेशी शासन को बदलना इतना आसान होगा?
अमेरिका के लिए तो यह बहुत बड़ी परेशानी है। एक तरफ सहयोगी, दूसरी तरफ शांति की कोशिश।
मोसाद के प्रमुख ने जो कहा, उसमें कोई hesitation हिचकिचाहट नहीं थी। यह स्पष्ट है कि वे अपना लक्ष्य जानते हैं।
लेकिन क्या इजरायल के पास इतनी ताकत है कि वह ईरान में regime change शासन परिवर्तन कर सके? यह सिर्फ बयानबाजी तो नहीं?
इतने सालों से चला आ रहा तनाव अब और गहरा रहा है। क्षेत्रीय स्थिरता के लिए यह बहुत खतरनाक है।
यह सब देखकर लगता है कि शांति की उम्मीद अब और कमजोर होती जा रही है। जन भरोसा तो अब राजनीतिक घोषणाओं में नहीं रहा।