हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य में अमेरिका और ईरान की घेराबंदी: भारत पर क्या पड़ेगा असर?
हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य, जो वैश्विक तेल आपूर्ति के लगभग 20% के लिए जिम्मेदार है, अब अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते tensions का केंद्र बन गया है। ईरान ने पहले इस मार्ग को अपने नियंत्रण में लेने का move उठाया था, और अब अमेरिका ने भी इसके आसपास naval blockade की घोषणा कर दी है। राष्ट्रपति ट्रंप के decision के तहत, अमेरिकी नौसेना अब उन जहाजों को रोकेगी जो ईरानी बंदरगाहों की ओर जा रहे हैं या उनसे आ रहे हैं। यह कदम वैश्विक ऊर्जा markets में और अधिक अस्थिरता की आशंका पैदा कर रहा है।
भारत के लिए यह स्थिति विशेष रूप से चिंताजनक है। देश अपनी कच्चे तेल की जरूरत का 85% से अधिक आयात करता है, और इसका अधिकांश हिस्सा खाड़ी के रास्ते हॉर्मुज़ से गुजरता है। अमेरिका की घेराबंदी ने भारत के लिए तेल आपूर्ति के मार्गों पर direct risk पैदा कर दिया है। इसके अतिरिक्त, रूस से तेल खरीदने के लिए मिली अमेरिकी छूट की expiration 11 अप्रैल 2026 को हो चुकी है। यदि इसे नवीनीकृत नहीं किया गया, तो यह भारत-अमेरिका relations में तनाव ला सकता है।
इस बीच, भारत ने अपने पुराने कूटनीतिक संबंधों के जरिए ईरान से भारतीय जहाजों को मार्ग देने की गारंटी हासिल की थी, लेकिन अब अमेरिकी blockade के कारण वह सुरक्षा assurance कमजोर पड़ गया है। ईरान की सद्भावना अब भारतीय जहाजों के लिए पर्याप्त नहीं हो सकती। प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति ट्रंप ने हाल ही में 40 मिनट तक फोन पर चर्चा की, जिसमें हॉर्मुज को खुला रखने के importance पर जोर दिया गया।
सरकार ने आम जनता को आश्वासन दिया है कि वर्तमान में LPG, PNG और CNG की shortage नहीं है। फिर भी, बढ़ती बीमा लागत और shipping costs से खुदरा ऊर्जा कीमतों पर pressure बढ़ रहा है। ग्रे मार्केट में ईंधन की कीमतें पहले से ही बढ़ रही हैं। सरकार ने कमर्शियल गैस के उपयोग को temporarily restricted कर दिया है और घरेलू आपूर्ति को प्राथमिकता दी है।
अंतरराष्ट्रीय दबाव के बीच, भारतीय दल वाशिंगटन में रूस और ईरान से तेल आयात के लिए waiver renewal की मांग को लेकर पैरवी कर रहा है। यह न केवल ऊर्जा सुरक्षा का मुद्दा है, बल्कि भारत की वैश्विक कूटनीतिक तालमेल की भी परीक्षा है। व्यापार समझौते की संभावना और टैरिफ में कमी के बावजूद, भारत को अब एक जटिल भू-राजनीतिक landscape में नैविगेट करना है।
अगर तेल की कीमतें बढ़ीं, तो रोजमर्रा की चीजों पर direct impact सीधा असर पड़ेगा। यह सिर्फ ईंधन तक सीमित नहीं रहेगा।
अमेरिका कहता है खुला मार्ग महत्वपूर्ण है, लेकिन खुद blockade घेराबंदी कर रहा है। क्या यह नहीं लगता दोहरा मापदंड?
भारत को ऊर्जा के लिए इतना आयात पर निर्भर रहने की बजाय renewable sources नवीकरणीय स्रोतों को बढ़ावा देना चाहिए था।
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मोदी और ट्रंप की बातचीत अच्छी लगी, लेकिन क्या वास्तव में diplomatic pressure कूटनीतिक दबाव काम करेगा?
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