क्या छूने से देवता अपवित्र हो जाते हैं…, सबरीमाला की सुनवाई में उठा सवाल, छठे दिन परंपरा-प्रथा पर हुए तर्क

सुप्रीम कोर्ट में सबरीमाला मामले समेत religious freedom और कानून के बीच टकराव पर सुनवाई जारी है। नौ जजों की बेंच छठे दिन भी इस मुद्दे पर विस्तृत बहस सुन रही है, जहाँ परंपरा, आस्था और संवैधानिक अधिकारों के बीच balance की आवश्यकता पर कई गहरे सवाल उठे। सीनियर एडवोकेट गिरी ने तर्क दिया कि अनुच्छेद 25 के तहत पूजा का right व्यक्ति की आस्था से जुड़ा है, और यह किसी भी मंदिर, मस्जिद या चर्च में जाने के विश्वास का हिस्सा है।

लेकिन उन्होंने स्पष्ट किया कि अगर कोई व्यक्ति कभी मंदिर में प्रवेश नहीं करता, तो उसके entry right को हर हाल में संवैधानिक रूप से सुरक्षित नहीं माना जा सकता। उन्होंने जोर देकर कहा कि priest की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। यदि कोई ऐसा अर्चक मूर्ति को छूए जिसे tradition स्वीकार न करती हो, तो यह श्रद्धालुओं की आस्था को hurt पहुँचा सकता है। ऐसे में राज्य का हस्तक्षेप धार्मिक मान्यताओं में दखलज़दगी माना जाएगा।

इस बीच एक गहरा सवाल उठा: क्या जन्म के आधार पर किसी को पुजारी बनने से रोका जा सकता है? गिरी ने माना कि ऐसे नियम fully अनुच्छेद 25 के तहत संरक्षित नहीं हैं। जस्टिस पी.बी. वराले ने पूछा कि क्या आज के पढ़े-लिखे समाज में कोई आस्था रखने वाला हमेशा तर्कहीन ही होता है? जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने सवाल किया कि अगर कोई व्यक्ति अपने ही धर्म की परंपरा को चुनौती देता है, तो क्या court उस पर फैसला कर सकती है?

जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने उदाहरण दिया: कहीं शिवलिंग को छुआ जा सकता है, तो कहीं नहीं—यह untouchability नहीं, बल्कि अलग-अलग पूजा पद्धति का हिस्सा है। सीनियर वकील गोपाल सुब्रमण्यम ने कहा कि यह मामला सिर्फ एक धर्म तक सीमित नहीं है, बल्कि सभी धर्मों के संदर्भ में देखा जाना चाहिए। गोपाल शंकरनारायणन ने जोर दिया कि बहस अब तक ज्यादातर हिंदू धर्म के नज़रिए से हुई है, जबकि मुस्लिम, ईसाई और पारसी समुदायों के मामलों जैसे हिजाब विवाद या पारसी महिलाओं के नियमों पर भी विचार होना चाहिए।

जस्टिस सुंदरेश ने अनुच्छेद 25(2) की ओर इशारा करते हुए कहा कि सार्वजनिक मंदिर सभी वर्गों के लिए खुले होने चाहिए। लेकिन यह बहस जारी है कि क्या यह नियम पंथों पर भी लागू होगा। जस्टिस बागची ने चिंता जताई कि अगर एक संप्रदाय के लोग दूसरे मंदिर या मस्जिद में प्रवेश करने से रोके जाएँ, तो क्या इससे सामाजिक tension नहीं बढ़ेगा? संविधान पीठ अब इसी नाजुक संतुलन पर विचार कर रही है।

प्रतिक्रियाएँ 8

  • राजीव_के

    अगर tradition को बचाना है तो क्या आस्था के नाम पर समाज को बाँटना ठीक है?

  • नीतू_भाटिया

    पुजारी के लिए केवल जन्म पर आधारित नियम अब नहीं चल सकते। शिक्षा और योग्यता को भी तो मान्यता मिलनी चाहिए।

  • संदीप_मल्होत्रा

    क्या court को धार्मिक पद्धतियों में दखल देना चाहिए? यह सवाल तो अब तक बना हुआ है।

  • प्रिया_एस

    हर मंदिर की अपनी practice है, लेकिन उसे भेदभाव का जाल नहीं बनना चाहिए।

  • अमित_धवन

    एक तरफ constitutional rights , दूसरी तरफ आस्था। न्यायाधीशों के लिए फैसला लेना आसान नहीं होगा।

  • लक्ष्मी_राज

    अगर शिवलिंग को छूने का नियम अलग-अलग है, तो क्या यह untouchability नहीं?

  • विकास_पांडे

    मुस्लिम और ईसाई समुदायों के मामलों को शामिल करना ज़रूरी था। यह सिर्फ हिंदू धर्म की बहस नहीं है।

  • श्रुति_मेहरा

    आस्था को नुकसान पहुँचाने का डर है, लेकिन क्या equality का अधिकार उससे कम महत्वपूर्ण है?

यह लेख तथ्यों पर आधारित है और अंग्रेज़ी सीखने के लिए पुनर्रचित किया गया है; पाठक प्रतिक्रियाएँ विविध दृष्टिकोणों के उदाहरण हैं।

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